“राजस्थान स्कूल हादसा: 7 बच्चों की मौत, संवेदना पर सियासत भारी! राजस्थान के दर्द पर जनमत जागरण की ‘सार्थक दृष्टि’ 📌 Editor View | पढ़ें हमारी विशेष रिपोर्ट

एडिटर व्यू || ‘सार्थक दृष्टिकोण’ से
समसामयिक विश्लेषण
“शिक्षामंत्री जी! चिता की राख ठंडी भी नहीं हुई थी… और आप मालाओं में मुस्कुराते रहे?”
“छात्रों की चिताएं सुलग रही थीं… और शिक्षा मंत्री के गले में माला डाली जा रही थी।”
किसी भी संवेदनशील समाज में यह दृश्य असहनीय होता। लेकिन दुर्भाग्यवश, यह दृश्य राजस्थान की वर्तमान व्यवस्था का असल चेहरा बनकर हमारे सामने आया है। झालावाड़ के पिपलोदी गांव में जब एक जर्जर स्कूल भवन ढह गया और सात मासूम बच्चों की मौत हो गई, तब पूरे प्रदेश में मातम पसर गया।
बच्चों के बस्ते खून से सन गए, दीवारें चीख उठीं, और गांव की गलियों में सिर्फ सन्नाटा था। लेकिन इसी प्रदेश में, हादसे के दूसरे दिन, शिक्षा मंत्री श्री मदन दिलावर भरतपुर में मंच पर मुस्कुरा रहे थे, माला पहन रहे थे, और स्वागत समारोह में जयकारे सुन रहे थे।
यह केवल समय का संयोग नहीं था – यह एक मानसिकता का प्रतिबिंब था।

📍 स्थान: पिपलोदी गांव, झालावाड़ | दिनांक: 25 जुलाई 2025
25 जुलाई को घटित इस भीषण हादसे के दिन ही शिक्षा मंत्री मदन दिलावर झालावाड़ पहुंचे थे। उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया, घायलों से अस्पताल में मुलाकात की और अधिकारियों से बात भी की — यह उनकी प्रशासनिक ज़िम्मेदारी थी, जिसे उन्होंने निभाया।
लेकिन ठीक अगले दिन, 26 जुलाई को, जब गांव में अभी मातम ही छाया था, माताएं बेसुध पड़ी थीं, और चूल्हे तक नहीं जले थे —
तब मंत्रीजी भरतपुर के मंच पर माला पहनकर, मुस्कुराते हुए कैमरे में कैद हो रहे थे।
क्या यही संवेदना है? क्या यही नेतृत्व है?
संवेदनशीलता केवल घटनास्थल पर पहुंचने से सिद्ध नहीं होती, वह बाद के आचरण से भी झलकती है।
ऐसे मौके पर यदि कोई मंत्री ‘शोक’ से ‘शो’ में चला जाए, तो वह जनता की पीड़ा का मखौल है।
और जब सवाल हुआ… तो झूठ क्यों बोला गया?
जब पत्रकारों ने भरतपुर में हुए समारोह पर सवाल उठाया, तो मंत्रीजी बोले –
“मैंने तो कई सालों से स्वागत करवाया ही नहीं।”
लेकिन मंच सजा था, माला पहनाई जा रही थी, और वीडियो गवाही दे रहे थे कि यह सब हुआ।
इस जवाब ने दुख को और ज़्यादा कुरेद दिया।
मंत्रीजी, दुख कम न कर सकें तो कम से कम उसका उपहास मत बनाइए
राज्य के शिक्षा मंत्री होने का अर्थ है कि आप हर उस मां के आंसू में सहभागी बनें, जिसने अपने बच्चे को स्कूल भेजा था – श्मशान नहीं।
आपका उस मंच पर बैठना, उन जयकारों में मुस्कुराना – उस मातम की गरिमा के विरुद्ध था।
क्या हम इतने असंवेदनशील हो गए हैं?
- एक दिन पहले मौतें हुईं,
- उसी दिन सड़कें कैमरों के लिए ठीक की गईं,
- और अगले दिन ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत हुआ।
क्या यही प्रशासनिक शालीनता है? क्या यही ‘नैतिक जिम्मेदारी’ का अर्थ है?
संवेदनाएं मर रही हैं… और सत्ता शोर मचा रही है
आज सवाल यह नहीं है कि मंत्री आए या नहीं, सवाल यह है कि वे ‘कैसे चले गए’?
क्या नेतृत्व केवल उपस्थिति का नाम है? या अनुपस्थिति की गरिमा का भी कोई अर्थ है?
✍️ राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
संपादक – जनमत जागरण
🕯️ मासूमों को श्रद्धांजलि और जनभावनाओं को नमन
📌 इसी विषय पर हमारी विशेष रिपोर्ट पढ़ें –




