ऋषिकेश की तपोभूमि में गूंजा भागवत का अमृतरस | पं.श्याम जी दुबे ने बताए जीवन और मोक्ष के सूत्र

सात दिवसीय कथा में तीसरे दिन पंडित श्याम जी दुबे ने जीवन निर्माण के सूत्र और मुक्ति का मार्ग बताया

जनमत जागरण @ ऋषिकेश से लाइव रिपोर्ट
ऋषिकेश केवल एक शहर नहीं, यह वह पावन धरा है जहां ऋषियों के तप, योग और अध्यात्म की गूंज आज भी सुनाई देती है। इसी पुण्यभूमि में 3 सितंबर से प्रारंभ हुई श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन श्रद्धालुओं के लिए अमृतरस के समान सिद्ध हुआ। सात दिवसीय इस कथा में सुप्रसिद्ध कथावाचक पंडित श्याम जी दुबे ने शास्त्रोक्त उदाहरणों के माध्यम से जीवन का मर्म और मोक्ष का मार्ग स्पष्ट किया।
“ज्ञान और गंगा का संगम – भव्य शोभायात्रा ने रचा अद्भुत दृश्य”

“कथा के शुभारंभ से पूर्व ऋषिकेश की पावन धरती पर भव्य शोभायात्रा निकाली गई। गंगा कलश यात्रा का यह दिव्य दृश्य अद्भुत था, जब श्रद्धालु त्रिवेणी संगम घाट पहुंचे। वहां वेद मंत्रों की गूंज के बीच पवित्र गंगाजल कलशों में भरकर कथा स्थल तक लाया गया। गंगाजल और श्रीमद् भागवत – ज्ञान और गंगा की पवित्रता का संगम – मानो इस कथा को और भी पावन बना गया। इस आयोजन के मुख्य यजमान रमेशचंद मोदी तथा विष्णु पांवडिया रहे, जिनके द्वारा सभी धार्मिक विधियों को संपूर्ण किया गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आस्था और भावनाओं ने वातावरण को भक्ति रस से सराबोर कर दिया।”

पहला दिन – जीवन की चार सीढ़ियां और भागवत का स्वरूप
कथा के प्रथम दिवस में पंडित श्याम जी दुबे ने कहा –
“जीवन को बनाने की चार सीढ़ियां शास्त्रों में बताई गई हैं। पहली सीढ़ी है भाव, दूसरी भक्ति, तीसरी भगवत्ता। भागवत और भगवान दोनों एक ही हैं। भागवत को भाव से भी गाया जा सकता है।”

उन्होंने आगे कहा कि जैसे जीवन को संवारने की चार सीढ़ियां हैं, वैसे ही जीवन को बिगाड़ने की भी चार श्रेणियां शास्त्रों में वर्णित हैं। इस संदर्भ में उन्होंने यह संदेश दिया कि जीवन में भावनाओं की पवित्रता ही परमात्मा तक पहुंचने का सरलतम साधन है।
दूसरा दिन – दुर्लभ मानव जीवन और भाव का महत्व
द्वितीय दिवस की कथा में श्याम जी दुबे ने दुर्लभ मानव जीवन के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा –
“देवता बनाना सरल है, किंतु इंसान बनना कठिन। मानव जीवन बड़ा ही दुर्लभ है। कर्म के द्वारा भी परमात्मा तक पहुंचना कठिन है, परंतु भाव से पहुंचना अत्यंत सरल है।”

कलयुग में केवल एक ही मार्ग सर्वोत्तम है – नाम-स्मरण का भाव। उन्होंने कहा कि आज के युग में भक्ति का सबसे सरल मार्ग है भावपूर्वक हरि नाम का उच्चारण। उन्होंने श्रोताओं को स्मरण कराया कि हमारे भीतर के भाव ही ईश्वर के समीप ले जाते हैं।
तीसरा दिन – महाभारत से लेकर मोक्ष तक की सीख
तीसरे दिन की कथा में श्याम जी दुबे ने गूढ़ शास्त्रीय प्रसंगों के माध्यम से जीवन का मर्म बताया। कथा की शुरुआत करते हुए उन्होंने भागवत को प्रणाम किया और कहा –
“जीवन में आप कितनी भी जीत हासिल कर लें, अंत में यदि वैराग्य न हो तो निराशा ही हाथ लगेगी। महाभारत युद्ध के बाद पांडवों का स्वर्गारोहण इसका उदाहरण है।”
उन्होंने अन्न की पवित्रता पर जोर देते हुए कहा –
“अन्न शरीर को पवित्र कर देता है, लेकिन मन को अपवित्र कर सकता है। यह इस पर निर्भर करता है कि हम किसका अन्न ग्रहण कर रहे हैं।”
कथा के बीच उन्होंने शिव और पार्वती के संवाद का उल्लेख किया और बताया कि स्वयं भोलेनाथ ने सभी कथाओं – रामकथा, कृष्णकथा, भागवत – का सृजन किया। वे ही त्रिभुवन के गुरु हैं।

श्रवण, मनन और कीर्तन – मुक्ति के तीन सोपान
राजा परीक्षित और श्रंगी ऋषि के प्रसंग को सुनाते हुए उन्होंने कहा कि विद्या का दुरुपयोग अनर्थ का कारण बनता है। उन्होंने श्रोताओं को मुक्ति के दो स्वरूपों के साथ उसका मार्ग भी बताया –
“मुक्ति का मार्ग तीन चरणों में है – श्रवण, मनन और कीर्तन। पहले श्रवण करें, फिर मनन करके उसे जीवन में उतारें, और अंत में भजन-कीर्तन करें। यही मन को आत्मा रूपी खूँटे में बांधने का सर्वोत्तम उपाय है।”
कथा का समापन करते हुए उन्होंने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में श्रीमद् भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और ईश्वर तक पहुंचने का सहज मार्ग है।

✍️ “स्थान परिवर्तन के पीछे छिपा आध्यात्मिक रहस्य” “देवभूमि का प्रवेशद्वार क्यों बना कथा का साक्षी?”
“बद्रीनाथ धाम में श्रीमद् भागवत कथा का होना निश्चित था, परंतु भूस्खलन ने मार्ग रोक दिया। पुलिस-प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से यात्रा स्थगित कर दी और कथा का आयोजन ऋषिकेश में हुआ। पर क्या यह मात्र प्राकृतिक घटना थी? या ईश्वर की अदृश्य योजना? ऋषिकेश को यूं ही तो देवभूमि का प्रवेशद्वार नहीं कहा जाता। कभी-कभी बाधाएं रास्ता नहीं रोकतीं, बल्कि हमें उस दिशा में मोड़ देती हैं जहां संदेश का प्रभाव सबसे अधिक होना है। शायद प्रकृति चाहती थी कि भागवत की अमृतधारा इस तपोभूमि में बहे, जहां हजारों साधकों की सांसें योग और भक्ति में रच-बसती हैं। यह परिवर्तन केवल स्थल का नहीं, दृष्टिकोण का था – कि संयोग भी ईश्वरीय संकेत हो सकता है।”
✍️ सार्थक चिंतन
“जीवन में आने वाले हर परिवर्तन को केवल व्यवधान न मानें। कभी-कभी मार्ग बदलता है ताकि मंज़िल और भी सार्थक हो जाए। भागवत कथा का स्थान परिवर्तन हमें यही सिखाता है कि ईश्वर का संकेत अक्सर अदृश्य होता है, परंतु उसका परिणाम दिव्य होता है।”। (राजेश कुमरावत ‘सार्थक’)



