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“सोयतकलां का मां चौसठ योगिनी सिद्धपीठ : शक्ति, संपत्ति और ज्ञान का अनूठा संगम”

प्राचीनता, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक चेतना का अद्वितीय केंद्र


✍️विंध्याचल की अनुपम शृंखलाओं पर, कंठाल नदी के प्रांजल तट पर अवस्थित सोयतकलां का मां चौसठ योगिनी सिद्धपीठ केवल उपासना-स्थल मात्र नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति का आध्यात्मिक ग्रंथालय है। यहाँ प्रत्येक विग्रह एक गहन रहस्य का उद्घाटन करता है और प्रत्येक प्रांगण में दिव्यता का संचार होता है।
महाकाली की उग्रता, महालक्ष्मी की ऐश्वर्यवत्ता और मां सरस्वती की वाग्देवी शक्ति—ये तीनों विग्रह साधक के अंतर्मन को दैवीय तेज से आलोकित करते हैं। चौसठ योगिनियों का यह पावन विहार मानो शक्ति-तत्त्व का विराट शास्त्र है, जिसकी साधना से मनुष्य मोह-बंधन से विमुक्त होकर सिद्धि, समृद्धि और सद्बुद्धि की ओर अग्रसर होता है।

चौसठ योगिनी सिद्धपीठ : प्राचीन नगरी सोयतकलां की आध्यात्मिक धरोहर

मां चौसठ योगिनी मंदिर केवल उपासना का स्थल नहीं, बल्कि सोयतकलां की आध्यात्मिक आत्मा है

जनमत जागरण @सोयतकलां ( Exclusive Spiritual Report ) आदिकाल से भारतीय संस्कृति में शक्ति की उपासना का विशेष महत्व रहा है। जब-जब अधर्म बढ़ा, तब-तब शक्ति स्वरूपा मां ने विभिन्न रूप धारण कर धर्म की रक्षा की है। इसी परंपरा की जीवित झलक हमें सोयतकलां के प्राचीन मां चौसठ योगिनी मंदिर में मिलती है।

मध्यप्रदेश और राजस्थान की सीमा पर स्थित यह नगर, जिसे कभी भीलों की नगरी कहा जाता था, आज नवरात्र के पावन अवसर पर मां की भक्ति में लीन है। यहाँ का मां चौसठ योगिनी सिद्धपीठ देश के केवल तीन प्रमुख चौसठ योगिनी मंदिरों में गिना जाता है — पहला उज्जैन, दूसरा कोलकाता और तीसरा सोयतकलां। इसीलिए सोयतकलां की आस्था और पहचान पूरे प्रदेश ही नहीं, देशभर में अलग स्थान रखती है।


🕉️ तीन प्रमुख विग्रह – शक्ति की त्रिविध धारा

मंदिर के गर्भगृह में स्थापित तीन प्रमुख देवियां सोयतकलां की आध्यात्मिक पहचान हैं—

  • मां महाकाली – असुर-विनाशिनी और निर्भीकता की दात्री।
  • मां महालक्ष्मी – ऐश्वर्य और समृद्धि की संवाहिका।
  • मां सरस्वती – ज्ञान, वाणी और विवेक की अधिष्ठात्री।

इन तीनों की संयुक्त उपासना साधक को जीवन की समस्त पूर्णताएं प्रदान करती है।

🕉️ शुभ अष्टमी-नवमी हवन: नगर और क्षेत्र में समृद्धि का संदेश

अष्टमी की रात्रि में चोसठ माता मंदिर में संपन्न होने वाला हवन न केवल नगरवासियों की आध्यात्मिक आकांक्षाओं को पूर्ण करता है, बल्कि आरोग्यता, स्वच्छता और समृद्धि का दिव्य संचार पूरे क्षेत्र में फैलाता है। इस हवन के माध्यम से भक्तजन अपने मन, आत्मा और परिवार को शुभ ऊर्जा से भरते हैं। प्रातःकाल की परिक्रमा से जीवन में सौभाग्य और शांति का अनुभव होता है। नवमी के दिन, नगर के सभी भक्तजन अपने अस्त्र-शास्त्र लेकर, पशुपालक अपने पशुओं की घंटियां और पूजनीय सामग्री लेकर मंदिर पहुंचते हैं। इन सामग्रियों को हवन में समर्पित कर, पुनः उन्हें पहनकर वे आगामी वर्ष की आरोग्यता और सुरक्षा की कामना करते हैं। इस अद्भुत यज्ञ की महिमा केवल मंदिर या नगर तक सीमित नहीं रहती; इसके प्रभाव से आसपास के क्षेत्र में भी श्रद्धालुओं में भक्ति और सजीव ऊर्जा का संचार होता है। यही कारण है कि इस हवन की चर्चा साल भर नगर एवं क्षेत्र में बनी रहती है और लोग अगले वर्ष के लिए इसकी प्रतीक्षा करते हैं। यह न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि समस्त समाज को एक साथ जोड़ने और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने का प्रेरणादायक माध्यम भी है।

🌸 भक्तिभाव और जनश्रुतियां

नवरात्र के दिनों में यहां श्रद्धालुओं की असंख्य भीड़ उमड़ती है। लोग मानते हैं कि इस सिद्धपीठ में साधना करने वाला साधक असफल नहीं होता। यहां की वायु में एक अलौकिक ऊर्जा है, जो तन-मन को स्पंदित कर देती है।

भक्तजन यह भी कहते हैं कि जो एक बार मां चौसठ के धाम में आता है, वह अपनी आत्मा में एक अवर्णनीय शांति और गहन स्थिरता अनुभव करता है।


🌸 चौसठ योगिनियां – देवी तत्त्व की पूर्ण परिपाटी

मां के इन तीन विग्रहों के पीछे चौसठ योगिनियों का विहार है। तांत्रिक साधना में इन योगिनियों को शक्ति की विविध धाराओं का प्रतीक माना गया है।

  • कुछ साधक को रक्षा देती हैं,
  • कुछ आत्मबोध कराती हैं,
  • और कुछ सांसारिक तथा आध्यात्मिक समृद्धि प्रदान करती हैं।

इन योगिनियों की आराधना साधक को संपूर्णता की ओर ले जाती है। यही कारण है कि यह मंदिर तांत्रिक और वैदिक परंपरा, दोनों में सिद्धपीठ माना जाता है।


🌊 कंठाल नदी और आध्यात्मिक आभा

मां चौसठ का यह मंदिर जीवनदायिनी कंठाल नदी के किनारे विंध्य पर्वत पर स्थित है। लोकमान्यता है कि मां स्वयं नगरवासियों को आपदाओं से बचाती हैं। वर्षा ऋतु में जब कंठाल नदी रौद्र रूप धारण करती है, तब नगर की रक्षा का भार मां चौसठ उठाती हैं।
एक किलोमीटर आगे जाकर यह नदी महानदी कालीसिंध से मिलती है। इस संगम का पावन प्रभाव नगर की आध्यात्मिकता को और अधिक गहराई देता है।


⛩️ तीन घाट और सांस्कृतिक धरोहर

सोयतकलां केवल एक मंदिर का नगर नहीं, बल्कि घाटों और देवालयों का नगर है।
यहाँ तीन प्रमुख घाट —

  • पेडिया घाट,
  • उण्डा घाट,
  • शंकर घाट

आज भी नगर की सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखते हैं। इन घाटों पर स्थित असंख्य देवी-देवताओं के प्राचीन मंदिर नगरवासियों को परंपरा और आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ते हैं।


🌺 चमत्कार और परंपरा

बुजुर्गों का कहना है कि मां चौसठ के दरबार में आज भी अनेक चमत्कार घटित होते हैं। दशहरे पर राजपूत समाज पारंपरिक वेशभूषा में विशेष पूजा-अर्चना करता है।
स्व. देवीलाल नागर से प्रारंभ हुई अनुष्ठान परंपरा को आज भी श्यामसुंदर नागर परिवार श्रद्धापूर्वक निभा रहा है।
नवरात्रि के दौरान यहां मां चौसठ भक्त मंडल द्वारा प्रतिदिन आकर्षक गरबे प्रस्तुत किए जाते हैं, जो नगर को भक्ति और उल्लास से सराबोर कर देते हैं।


🏛️ मंदिर का आधुनिक स्वरूप

सन 1980 से लेकर अब तक लगभग इन 5 दशकों में विभिन्न समितियां के माध्यम से नगर के छोटे से लेकर बड़े तक हर वर्ग हर समाज के भक्तों द्वारा निरंतर दान और सहयोग से मंदिर का कायाकल्प होता रहा है। शासन द्वारा भी सुरक्षा दीवार और बाउंड्री निर्माण कार्य के लिए 84 लाख रुपये स्वीकृत किए गए हैं।

आज मंदिर का गर्भगृह सफेद संगमरमर से सुसज्जित होकर दिव्यता का नया स्वरूप ले रहा है। जो की पूर्णता की ओर है यह निर्माण नगर की चार – पांच पीढ़ियों की आस्था और श्रम का साकार रूप है।


🌿 सार्थक चिंतन

“मां चौसठ योगिनी मंदिर केवल आस्था का केन्द्र नहीं, यह हमारे अंतरमन का दर्पण है। यहां शक्ति केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि जीवन की प्रेरक ऊर्जा है। जो साधक यहां आता है, वह पाता है—काली से साहस ,लक्ष्मी से संतोष, सरस्वती से विवेक , यही संतुलन जीवन को सफल और सार्थक बनाता है।”

मां चौसठ योगिनी मंदिर केवल उपासना का स्थल नहीं, बल्कि सोयतकलां की आध्यात्मिक आत्मा है।
यह मंदिर हमें सिखाता है कि—

  • साहस बिना जीवन अधूरा है,
  • समृद्धि बिना समाज अपूर्ण है,
  • और विवेक बिना संस्कृति निस्तेज है।

महाकाली हमें निर्भीकता देती हैं, महालक्ष्मी ऐश्वर्य देती हैं और सरस्वती विवेक प्रदान करती हैं। जब ये तीनों मिलती हैं, तब समाज, संस्कृति और मानव जीवन पूर्णता को प्राप्त करते हैं। यही इस सिद्धपीठ का शाश्वत संदेश है कि—
👉 “शक्ति, संपत्ति और ज्ञान का संतुलन ही जीवन को सार्थक और संस्कृति को अमर बनाता है।” – राजेश कुमरावत ‘सार्थक’


✨ काव्यात्मक समापन

श्लोक
जयति जयति जगदम्बा, त्रिविध शक्ति स्वरूपिणी।
महाकाली महालक्ष्मी, सरस्वती परिपूरिणी।।

भक्तजनानां रक्षायै, सिद्धिदायै सदा स्थिता।
सोयतपुर्यां विख्याता, योगिनि चौसष्ठिता।।


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