संघ साधना के शताब्दी वर्ष में सोयतकलां में गूंजा राष्ट्रभाव : विभाग प्रचारक हिरेंद्र सिंह का आह्वान – पंच परिवर्तन से नव भारत का संकल्प

🚩“संस्कारों की ज्योति से ही होगा राष्ट्र का पुनरुत्थान”
जनमत जागरण @सोयतकलां ।
शरद की वर्षा में भी भीगे कदम, हाथों में घोष, नेत्रों में तेज और हृदय में देश का भाव—यह दृश्य था सोयतकलां नगर का, जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर 720 स्वयंसेवकों ने एक स्वर में अनुशासन का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो नगर के इतिहास में दर्ज हो गया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि कैलाश चौधरी, खंड संचालक माननीय द्वारकीलाल पाटीदार, और मुख्य वक्ता विभाग प्रचारक हिरेंद्र सिंह मंचासीन रहे।
कार्यक्रम में 225 से अधिक नगर के प्रबुद्ध नागरिकों और मातृशक्ति की उपस्थिति ने वातावरण को भावपूर्ण बना दिया।

🌸 आरंभ से ही अनुशासन की छटा
कार्यक्रम की शुरुआत व्यक्तिगत गीत, सुभाषित और सामूहिक गीतों से हुई। इसके बाद शस्त्र पूजन और सामूहिक व्यायाम, योग तथा समता प्रदर्शन ने स्वयंसेवकों के भीतर निहित साधना और अनुशासन की झलक दी। हर आंदोलन में एक लय थी, हर कदम में एक संदेश — “राष्ट्र ही सर्वोपरि”।
🕉️ मुख्य वक्ता हिरेंद्र सिंह का प्रेरणादायी उद्बोधन : “संघ समाज के मन का जागरण है”
मुख्य वक्ता ने कहा —
“हिंदू समाज कभी ऊर्जा, आत्मगौरव और विवेक का स्रोत रहा है, लेकिन जब वह आत्मविस्मृति में गया तो विदेशी शक्तियों ने शासन किया। डॉक्टर हेडगेवार ने उस समय संघ का दीप प्रज्वलित किया जब हिंदू समाज अपने ही अस्तित्व से अपरिचित हो गया था। आज वही दीप विश्व में भारत की पहचान बन चुका है।”
उन्होंने कहा कि संघ केवल संगठन नहीं, बल्कि संस्कारों की प्रयोगशाला है, जहां से समाज के हर वर्ग में जागरण की ध्वनि जाती है।
🌿 पंच परिवर्तन : संघ का नवभारत दृष्टिकोण

मुख्य वक्ता ने बताया कि शताब्दी वर्ष का अर्थ केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मसमीक्षा और नवसंस्कार का काल है। संघ का उद्देश्य है समाज में पांच प्रमुख क्षेत्रों में परिवर्तन लाना —
1️⃣ सामाजिक समरसता – एकात्मता का आह्वान
संघ मानता है कि समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी एकता है। आज भी जाति, पंथ और वर्ग के आधार पर भेदभाव समाज को कमजोर कर रहा है। संघ चाहता है कि हर हिंदू अपने भीतर से ‘ऊंच-नीच’ की दीवारें तोड़े और स्वयं को एक विराट परिवार का अंग माने। समरस समाज ही राष्ट्र की असली रीढ़ है।

2️⃣ पर्यावरण संतुलन – प्रकृति के प्रति पुनः श्रद्धा
प्रकृति हमारी माता है, उपभोग नहीं। संघ चाहता है कि समाज पुनः पेड़-पौधों, नदियों, और भूमि को ‘देवी स्वरूप’ माने। जल बचाओ, प्लास्टिक हटाओ और वृक्ष लगाओ — यह केवल पर्यावरण अभियान नहीं, बल्कि संस्कार आधारित जीवन पद्धति है।
3️⃣ स्वदेशी आचरण – आत्मनिर्भरता का अभ्यास
संघ स्वदेशी को आर्थिक नहीं, आत्मसम्मान का आचरण मानता है। ‘स्व भाषा, स्व वेश, स्व उद्योग और स्व उत्पाद’ — यही राष्ट्र की असली रक्षा है। जड़ों से जुड़ना और विदेशी परावलंबन से मुक्त होना ही वास्तविक स्वतंत्रता है।

4️⃣ नागरिक अनुशासन – राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण
हर सभ्य राष्ट्र का आधार अनुशासन है। संघ चाहता है कि भारत के युवा केवल पढ़े-लिखे नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ और संयमित नागरिक बनें। कानून का पालन, समय का सम्मान और समाज के प्रति संवेदनशीलता — यही राष्ट्र निर्माण के मूल स्तंभ हैं।
5️⃣ मातृशक्ति का सहयोग – राष्ट्र के हृदय में ऊर्जा का संचार
संघ मानता है कि बिना मातृशक्ति के कोई भी परिवर्तन संभव नहीं। जिस दिन घर की माता और बहनें राष्ट्रभाव से जुड़ेंगी, उसी दिन समाज सशक्त होगा। शिक्षा, संस्कार और संस्कृति — ये तीनों स्तंभ मातृशक्ति के माध्यम से ही सुदृढ़ हो सकते हैं।
मुख्य वक्ता ने कहा —
“अब समय है ‘पांचवा गियर’ लगाने का। समाज का मन तैयार है, दिशा स्पष्ट है — हमें केवल गति देनी है। संघ कार्य अब केवल शाखा तक सीमित नहीं, बल्कि घर-घर तक पहुंचने का संकल्प है।”
🌧️ बारिश में भी न रुका राष्ट्रभाव

उद्बोधन के बीच भीषण वर्षा होने लगी, किंतु 720 स्वयंसेवक अडिग रहे। स्वयंसेवक भीगते हुए, धैर्य और अनुशासन का परिचय देते रहे। यह दृश्य नगर के नागरिकों के लिए भावनात्मक क्षण बन गया —

“संघ का अनुशासन वर्षा से भी प्रखर है,” — ऐसा भाव सभी के मुख से एक स्वर में निकला।
🚩 भव्य पथ संचलन : श्रद्धा, अनुशासन और एकता का प्रदर्शन

कार्यक्रम के पश्चात नगर के प्रमुख मार्गों से ऐतिहासिक पथ संचलन निकला। घोष की लय पर 720 स्वयंसेवक कदमताल करते आगे बढ़े। नागरिकों और मातृशक्ति ने पुष्प वर्षा से स्वागत किया। नगर में यह संचलन एकता, शौर्य और राष्ट्रनिष्ठा का प्रतीक बन गया।
✍️ “शताब्दी वर्ष – आत्मसमीक्षा से आत्मविश्वास तक”

मुख्य वक्ता के शब्दों ने श्रोताओं के भीतर यह भाव जगाया कि यह शताब्दी वर्ष केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य की तैयारी है।
“हर हिंदू घर तक पहुंचना है, हर मन में संस्कार जगाना है, हर परिवार को भारतमाता से जोड़ना है — यही संघ का पथ है।”
कार्यक्रम का समापन गीत “सप्त हृदय की ज्वाला बनाकर… कोटि-कोटि चरण बढ़ रहे…” के साथ हुआ, जिसने वातावरण को राष्ट्रभाव से भर दिया।

🚩 सार्थक दृष्टिकोण : “संघ का पंच परिवर्तन – समाज का आत्मबोध”
संघ के शताब्दी वर्ष का यह काल केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का समय है। सौ वर्ष की यात्रा में संघ ने यह सिद्ध किया है कि संगठन केवल शाखाओं का विस्तार नहीं होता — वह व्यक्ति से परिवार, और परिवार से समाज तक संस्कारों की श्रृंखला है। विभाग प्रचारक हिरेंद्र सिंह का उद्बोधन इसी जागरण का संदेश है। उन्होंने जिस पंच परिवर्तन की रूपरेखा प्रस्तुत की — वह राष्ट्र जीवन की नई दिशा है।
सामाजिक समरसता केवल एक नारा नहीं, बल्कि वह चेतना है जो ‘मैं’ को ‘हम’ में बदलती है। पर्यावरण संतुलन, मनुष्य और प्रकृति के बीच फिर से श्रद्धा का संवाद स्थापित करने की पुकार है। स्वदेशी आचरण, आर्थिक आत्मनिर्भरता से अधिक संस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है। नागरिक अनुशासन, राष्ट्र के चरित्र का दर्पण है, और मातृशक्ति का सहयोग, समाज की आत्मा का पुनर्जागरण।
आज जब विश्व आत्मकेंद्रित सभ्यता की ओर बढ़ रहा है, तब भारत को आत्मबोध की ओर लौटना होगा — और यही संघ का शताब्दी संदेश है।
“पांचवा गियर” केवल गति नहीं, बल्कि वह चेतना है जो राष्ट्र को फिर से ‘संगठित, संस्कारित और समर्थ’ बनाने की दिशा में आगे बढ़ा रही है। ✍️– राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ संपादक, जनमत जागरण




