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सुसनेर नगर परिषद अध्यक्ष पर लोकायुक्त की कार्रवाई | 30 लाख की ई-रिक्शा खरीदी में अनियमितता | 41-क के तहत पद से हटाने की तलवार

📰 सुसनेर नगर परिषद अध्यक्ष की कुर्सी पर मंडराया खतरा, अध्यक्ष पर लटकी पद से हटाने की तलवार

लोकायुक्त में शिकायत पर पंजीबद्ध जांच प्रकरण में उपसचिव ने जारी किया कारण बताओ नोटिस


जनमत जागरण @ सुसनेर से दीपक जैन।

नगर परिषद सुसनेर का हाल अब किसी राजनैतिक रंगमंच से कम नहीं रहा — कभी भाजपा का झंडा, तो कभी कांग्रेस की पताका… पर जनता के हिस्से में अब भी सिर्फ गड्ढे, गंदगी और गुटबाज़ी है। नगर परिषद में वर्षों से चली आ रही अनियमितताओं और आरोप-प्रत्यारोप की इस कड़ी में अब अध्यक्ष पद पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। लोकायुक्त कार्यालय में दर्ज गंभीर शिकायत के आधार पर मध्यप्रदेश शासन के नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने सुसनेर नगर परिषद अध्यक्ष श्रीमती लक्ष्मी सिसोदिया को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
प्रकरण क्रमांक 0035/ई/2024 में जारी इस नोटिस में अध्यक्ष से 15 दिनों में जवाब मांगा गया है, अन्यथा म.प्र. नगर पालिका अधिनियम 1961 की धारा 41-क के तहत पद से पृथक करने की कार्रवाई प्रस्तावित है।

नोटिस में यह स्पष्ट कहा गया है कि अध्यक्ष अपने कर्तव्यों के विधि अनुसार पालन में विफल रहीं और निकाय हित में उनका पद पर बने रहना लोकहित के प्रतिकूल माना गया है।


दो प्रकरणों में वित्तीय अनियमितता का आरोप

आरोप क्रमांक 01 – ई-रिक्शा खरीदी में धांधली

स्वच्छ भारत मिशन के तहत नगर परिषद द्वारा अध्यक्ष के अधिकारों की सीमा से परे जाकर 5 ई-रिक्शा वाहनों की खरीदी लगभग 30 लाख रुपए की लागत से की गई।
जांच में पाया गया कि बोली आमंत्रण की प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ — निर्धारित 30 दिनों की जगह केवल 10 दिन का समय दिया गया, समाचार पत्रों में विज्ञप्ति नहीं छपी और नगर पालिका (वित्त एवं लेखा) नियम 2018 के प्रावधानों की अनदेखी की गई।
एक ई-रिक्शा की बाजार कीमत ₹1,57,142 थी, जबकि परिषद ने इसे ₹4,81,200 में खरीदा। इससे निकाय को ₹16,20,285 की आर्थिक हानि पहुंची। इस गड़बड़ी के लिए अध्यक्ष और सीएमओ दोनों को उत्तरदायी पाया गया।

आरोप क्रमांक 02 – हाथ कचरा गाड़ियों की खरीदी

नगर की सफाई के लिए खरीदी गई 40 हाथ कचरा गाड़ियां और 4 टायर वाली गाड़ियां में भी वित्तीय अनियमितताएं पाई गईं।
यह खरीदी भी जेम पोर्टल से बिना नियमों के पालन के की गई। अध्यक्ष ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर स्वीकृति दी, जिसके लिए उन्हें और सीएमओ को फिर से दोषी पाया गया।


राजनीति का नया रंग – जब दल ही धोखा दे जाए

सुसनेर की राजनीति में ये पहला मौका नहीं जब “दल बदल” ने चरित्र का चेहरा ढकने का काम किया हो।
कभी भाजपा के झंडे तले बैठी परिषद की कमान, अब कांग्रेस के मंच पर तस्वीर खिंचवा रही है।
भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज कराने वाले भी नेता, बचाव करने वाले भी नेता — और बीच में पिस रही है जनता, जिसे सिर्फ वादों और विज्ञप्तियों की सफाई मिल रही है, नगर की नहीं।

ब्लॉक कांग्रेस महामंत्री दीपक राठौर और कुछ पार्षदों द्वारा की गई लोकायुक्त शिकायत अब उसी कांग्रेस अध्यक्ष के सिर दर्द बन गई है जो कुछ ही समय पहले भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुई थीं।
अब सवाल यह है कि क्या सुसनेर की राजनीति जनता के लिए है, या नेताओं के लिए पद और प्रतिशोध का खेल?


🪶 **सार्थक दृष्टिकोण:

“जब दल बदलने की होड़ लगे, तो ईमानदारी सबसे सस्ती बोली बन जाती है”

सुसनेर की यह कहानी दरअसल प्रदेश की राजनीति का आईना है —
जहाँ नैतिकता को दलों की दराज में बंद कर दिया गया है और जनता को बस चुनावी भाषणों की धूप में सुखाया जा रहा है।

नेताओं की यह नई नस्ल अब विचारधारा नहीं, अवसर में विश्वास करती है।
कभी भगवा ओढ़ती है, कभी तिरंगा पहन लेती है — और जब कुर्सी डगमगाती है, तो धर्म, समाज, विकास सब भूलकर दल का झंडा बदल लेती है।
राजनीति अब तप नहीं, व्यापार बन चुकी है।

लोकायुक्त का नोटिस आया तो सबका चेहरा उतर गया —
पर हैरानी यह है कि प्रदेश स्तरीय नेता भी इस भ्रष्टाचार की राख में अपनी गुटबाज़ी की रोटियाँ सेंक रहे हैं।
भोपाल से लेकर दिल्ली तक सब जानते हैं कि नीचे क्या चल रहा है,
पर जब तक उनकी पार्टी का “वोट बैंक” सुरक्षित है, तब तक हर घोटाला सिर्फ एक “फाइल” भर है।

जनता अब यह समझ चुकी है कि
नेताओं की जुबान पर विकास और जेब में दलाली चलती है।
आज भाजपा और कांग्रेस दोनों का फर्क मिट चुका है —
ऐसा लगता है बस प्रतीक अलग हैं, प्रवृत्ति एक ही है?

सुसनेर में जो हो रहा है, वह कल किसी और नगर में होगा,
क्योंकि जब राजनीति मठ बन जाए और नेता व्यापारी,
तो लोकतंत्र महज़ पोस्टर में बचता है।

– राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
संपादक, जनमत जागरण | सार्थक दृष्टिकोण


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