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36 साल की तपस्या का विराम: जैन संत मुनिश्री मौन सागर जी का संलेखना पूर्वक समाधिमरण

सुसनेर में जैन समाज की भावभीनी विदाई: मुनि श्री मौन सागर जी का समाधि मरण, हजारों श्रद्धालु हुए भावविभोर


🌼 मौन सागर बने समाधि सागर : 36 वर्षों की साधना का हुआ सार्थक विराम

✨ “मौन बोलता है, जब आत्मा जागती है।”

त्याग और तप के इस युग में, जब भोग और प्रदर्शन जीवन का हिस्सा बन चुके हैं — उस समय मौन सागर जी का समाधि मरण हमें यह याद दिलाता है कि सच्चा जीवन “त्याग की अनुभूति” में बसता है, न कि संग्रह की उपलब्धियों में।
सुसनेर की पवित्र भूमि पर बीते 16 दिनों से चल रही मौन और उपवास की यह साधना अब मुक्ति में परिणत हो गई।
36 वर्षों की गहन तपस्या, मौन व्रत और आत्मसंयम के बाद मुनि श्री मौन सागर जी ने यम संलेखना के माध्यम से शरीर से नहीं, संसार से विदाई ली है।
उनके समाधि मरण ने यह सिखाया — “मौन बोलता है, जब आत्मा जागती है।”

जैन संत मुनि श्री मौन सागर जी ने यम संलेखना पूर्वक किया समाधि मरण

सुसनेर से संवाददाता : दीपक जैन

जैन धर्म के महान संत, समाधिस्थ मुनि भूतबलि सागर जी के 73 वर्षीय शिष्य मुनि श्री मौन सागर जी महाराज ने शनिवार तड़के सुसनेर के त्रिमूर्ति दिगम्बर जैन मंदिर में अपनी महान साधना का अंतिम पड़ाव पूर्ण कर यम संलेखना पूर्वक समाधि मरण प्राप्त किया।
24 अक्टूबर से आरंभ हुई इस मौन साधना की यह दिव्य यात्रा शुक्रवार-शनिवार की मध्यरात्रि 2 बजकर 1 मिनट पर पूर्ण हुई — जब मुनि श्री ने देह त्यागकर समता मरण को प्राप्त किया। इसी के साथ 36 वर्षों की दीर्घ तप-साधना का मौन विराम हुआ, जो वास्तव में मुक्ति का उद्घोष बन गया।


🕊️ त्याग की डोल यात्रा में उमड़ा जनसागर

शनिवार सुबह साढ़े नौ बजे नगर के विभिन्न मार्गों से होती हुई डोल यात्रा त्रिमूर्ति मंदिर प्रांगण में पहुंची। हजारों श्रद्धालुजन “जिनवाणी जय” और “त्यागी साधु जय” के घोष के साथ शामिल हुए। राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्यप्रदेश सहित अनेक प्रांतों से समाजजन सुसनेर पहुंचे।
थाना प्रभारी केसर राजपूत के नेतृत्व में पुलिस बल ने शांतिपूर्ण व्यवस्था संभाली। नगर के बाजार, प्रतिष्ठान और संस्थान शोक-संवेदना में स्वेच्छा से बंद रहे।


🔥 गृहस्थ जीवन के परिजनों द्वारा हुआ अग्निसंस्कार

त्रिमूर्ति मंदिर परिसर में संघस्थ ब्रह्मचारी मंजुला दीदी, पं. शांति लाल जैन, अशोक जैन मामा और मुकेश शास्त्री के मार्गदर्शन में पूजन, पाठ और मंत्रोच्चार के साथ मुनि श्री का अग्निसंस्कार हुआ।
गृहस्थ जीवन के परिजनों ने अग्नि संस्कार किया।
लाभार्थी श्रीमती मधु गोधा (पुत्र दीपेश गोधा, इंदौर) ने सहयोग दिया, रत्न वाटिका परिवार ने समिधा प्रदान की, और निलेश कुमार हुकुमचंद छाबड़ा, देवास ने पूजन का लाभ लिया।
श्रद्धालुओं ने श्रीफल अर्पित कर परिक्रमा दी और समाधिस्थ संत को नमन किया।


🕯️ 16 दिन की समाधि साधना का पूर्ण विराम

24 अक्टूबर से आरंभ यम संलेखना की यह साधना तब प्रारंभ हुई जब मुनि श्री ने अपने समस्त दायित्व अनुज मुनि श्री मुनि सागर जी को सौंप दिए थे।
अन्न-जल का पूर्ण त्याग कर वे निर्यापक संत के रूप में मौन, उपवास और समता के ध्यान में स्थित हुए।
16वें दिन — प्रातः 2:01 बजे — उन्होंने पूर्ण चेतना में देह त्याग कर जैन परंपरा के समता मरण (संलेखना समाधि) की वह दुर्लभ स्थिति प्राप्त की, जो विरले ही संतों को नसीब होती है।


💐 नगर ने विनयांजलि अर्पित की

जैन समाज ही नहीं, समूचे नगर में शोक की लहर फैल गई।
त्रिमूर्ति मंदिर परिसर में आयोजित विनयांजलि सभा में समाजजन, साधु-संघ और नगरवासी हजारों की संख्या में शामिल हुए।
सभी ने एक स्वर में कहा — “यह संत नहीं, त्याग की सजीव परिभाषा थे।”


संपादकीय सार्थक चिंतन


मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं, बल्कि आत्मा का उद्घोष है।
मुनि श्री मौन सागर जी ने हमें यह सिखाया कि जीवन की सबसे बड़ी जीत, त्याग में है — जब वस्तुएं तुम्हें त्यागने लगे, उससे पहले तुम उन्हें त्याग दो।
आधुनिक युग में जहां लोग जीवन को पकड़ने की दौड़ में हैं, वहीं मौन सागर जी ने जीवन को छोड़ने की कला में सिद्धि प्राप्त की।
उनका समाधि मरण किसी अंत का नहीं, बल्कि आत्मा की अनंत यात्रा का आरंभ है — यही जैन धर्म का शाश्वत संदेश है। - 


 -राजेश कुमरावत 'सार्थक'

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