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घृणा अपराध : समाज, लोकतंत्र और मानवता के लिए बढ़ता खतरा, रोक जरूरी क्यों?✒️ नव वर्ष पर हॅंसमुख चिंतन 👉🏻डॉ बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’

✒️ नव वर्ष पर हॅंसमुख चिंतन 👉🏻

“घृणा अपराध : एक गंभीर समस्या, इस पर रोक लगाई जाए!

डॉ बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’

घृणा अपराध एक ऐसा अपराध है जिसमें किसी व्यक्ति या समूह को उनकी जाति, धर्म, रंग, राष्ट्रीयता या अन्य किसी आधार पर निशाना बनाया जाता है। यह अपराध अक्सर हिंसा, धमकी या अन्य प्रकार की उत्पीड़न के रूप में होता है। तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद विश्व के अधिकांश देशों के साथ-साथ
हमारे भारत में घृणा अपराध दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है।

घृणा अपराध के प्रकार:

  1. जातिगत हिंसा: किसी व्यक्ति या समूह को उनकी जाति के आधार पर निशाना बनाना। जैसा कि हमारे देश में जाति के आधार पर शारीरिक अथवा मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है।
  2. धार्मिक हिंसा : किसी व्यक्ति या समूह को उनके धर्म के आधार पर निशाना बनाना। जैसा कि इस्लामिक देश में शिया और सुन्नी में मतभेद होना तथा भारत, बांग्लादेश तथा पाकिस्तान में मुसलमान समुदाय द्वारा हिन्दू समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव करना तथा मौत के घाट उतारने की घटनाएं होती रहती है।
  3. रंगभेद : किसी व्यक्ति या समूह को उनके रंग के आधार पर निशाना बनाना। जैसा कि अमेरिका और अफ्रीका में रंग के आधार पर काले गोरे में भेदभाव किया जाता है।
    4.राष्ट्रीयता के आधार पर हिंसा: किसी व्यक्ति या समूह को उनकी राष्ट्रीयता के आधार पर निशाना बनाना। इस तरह की घटनाएं प्रायः सभी देशों में देखने को मिलती है।

घृणा अपराध के द्वारा होने वाली हानि:

  1. सामाजिक हानि :
  • समाज में तनाव और विभाजन बढ़ता है। जैसा कि 1947 में भारत – पाकिस्तान बंटवारे के समय बढ़ा था। पाकिस्तान में सदियों से एक साथ रहने वाले मुस्लिम समाज ने हिंदू समाज को बेहिचक शारीरिक एवं मानसिक हानियां पहूचाई गयी थीं। भारत का सिंधी समुदाय इसका भुक्तभोगी है।
  • लोगों में भय और असुरक्षा की भावना बढ़ती है। जैसा कि वर्तमान में बांग्लादेश में हिन्दू समुदाय के साथ हो रहा है ‌।
  • सामाजिक एकता और समरसता को नुकसान पहुंचता है। भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान इसका जीता-जागता उदाहरण बना हुआ है।
  1. राजनीतिक हानि :
  • राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है। भारत में केराना, शाहीन बाग दिल्ली, बेगमपुरा उज्जैन,भागलपुर, संभलपुर आदि स्थानों पर धर्म के नाम पर मतदान होता है। जम्मू-कश्मीर, पश्चिमी बंगाल,केरल, तामिलनाडु आदि राज्यों में आजादी के समय से ही देखने को मिल रहा है।
  • सरकार की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है। जैसा कि वर्तमान में पाकिस्तान और बांग्लादेश की सरकार के नुमाइंदों को विश्व के अधिकांश देशों में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है। अभी हाल ही में हुए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पुतिन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की तरफ देखा तक नहीं! और मीटिंग के लिए 40 मिनट तक इंतजार करवाया?
  • अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में तनाव बढ़ता है। जगजाहिर है कि धर्म के आधार पर घृणा अपराध को बढ़ावा देने वाले देशों का एक दुसरे के साथ डिप्लोमेटिक संबंध में खटास पैदा हो जाती है। एक दूसरे के देशों से राजदूत वापस बुला लिए जाते हैं। अभी हाल ही में भारत ने बांग्लादेश से अपने राजनैयिक संबंध तोड़ लिये हैं।
  1. धार्मिक हानि :
  • धार्मिक तनाव बढ़ता है। जैसा कि हमारे देश में अयोध्या धाम और अभी हाल ही में पश्चिमी बंगाल में बाबरी मस्जिद निर्माण को लेकर बना हुआ है।
  • धार्मिक समुदायों के बीच संघर्ष बढ़ता है। हमारे देश के गांव- शहर में इस तरह का झगड़ा फ़साद आए दिन देखने – सुनने को मिलते रहते हैं।
  • धार्मिक स्वतंत्रता को खतरा होता है। जैसा कि इस्लाम में शिया और सुन्नी, ईसाई में कैथोलिक और प्रोटेस्टिक, बौद्ध में हिनायान और महायान आदि में एक ही धर्म के होने के बावजूद एक दूसरे को खतरा रहता है।
    इतना जान लेने के बाद यह तो तय है कि इस खौफनाक मंजर से निजात पाने की निहायत जरूरत है। घृणा अपराध को रोकने के लिए सभी स्तर पर उपाय खोजने की आवश्यकता है।
    आईए सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और कानूनी पहलुओं पर आधारित उपाय को जानने का प्रयास करते हैं।

सामाजिक उपाय:

  1. जागरूकता और शिक्षा: लोगों को घृणा अपराध के बारे में जागरूक करना और इसके लाभ और हानि की शिक्षा देना आवश्यक है।
  2. समुदाय की भागीदारी : समुदाय की भागीदारी से घृणा अपराध को रोकने में मदद मिल सकती है। प्रत्येक धर्म के समुदाय के अगुआओं को चिंतन शिविर आयोजित कर चिंतन करना चाहिए कि इस तरह घृणा भाव क्यों? क्या मिलेगा? क्या मिल रहा है? क्या हमारे धर्म ग्रंथों में घृणा करना आदेशित है? आदि आदि। मुझे लगता है विश्व में विद्यमान सभी धर्मों में भाईचारे की ही शिक्षा दी गई है। प्रेम भाव से मिलजुल कर रहने की बात कही गई है। यदि किसी धर्म में घृणा करना लिखा है अथवा कहा है तो वह धर्म पवित्र हो ही नहीं सकता?
  3. सामाजिक एकता : सामाजिक एकता और समरसता को बढ़ावा देना आवश्यक है। उदाहरण स्वरुप एक गांव में एक ही धर्म के मानने वाले अलग अलग जाति के लोग रहते हैं। पूर्वज सदियों से एक शमशान,एक मंदिर या मस्जिद या गुरुद्वारा या चैत्यालय या बौद्ध मठ एवं एक ही कुआं या नदी या तालाब का पानी पीते आए हैं, तो फिर स्वतंत्रत भारत में झगड़ा क्यों?

धार्मिक उपाय:

  1. धार्मिक नेताओं की भूमिका : धार्मिक नेताओं को घृणा अपराध के खिलाफ बोलने और लोगों को जागरूक रहने के लिए प्रेरित करना चाहिए। ज्ञातव्य है कि भारत में इस्लाम 13 वीं शताब्दी में आया अर्थात 800 पहले। इसके पहले भी तो हमारे पूर्वज सदियों से एक साथ रहते थे। जब 800 साल से साथ रह रहे हैं तो आजादी के बाद क्यों नहीं? हमारे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई बौद्ध, पारसी और बाहुला सभी धर्म गुरूओं द्वारा एकता, समानता, सहिष्णुता, सौहार्दपूर्ण वातावरण का , भाईचारे का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए।
  2. धार्मिक शिक्षा : धार्मिक शिक्षा में घृणा अपराध नहीं करने के बारे में जानकारी देना आवश्यक है। आप जिस धर्म के भी हों उस धर्म के ग्रंथ के हिसाब से धर्म का पालन करो। उसके हिसाब से अपना जीवन व्यतीत करो और अपनी पीढ़ी को सद्गुण के साथ आगे बढ़ाओ। मेरे हिसाब से धार्मिक शिक्षा नीति यही कहती है और होना भी जरूरी है।
  3. धार्मिक समुदायों के बीच संवाद : धार्मिक समुदायों के बीच संवाद और समझ को बढ़ावा देना आवश्यक है। पुराने जमाने में शाशास्त्र अर्थात शास्त्रों में लिखे गए गूढ़ ज्ञान पर चिंतन मंथन करने की प्रथा थी। शाशास्त्र प्रथा सभी धर्मों में प्रचलित हैं। पुरानी संस्कृति को सभी धर्मों में जीवित करने की आवश्यकता है।

सांस्कृतिक उपाय:

  1. सांस्कृतिक आदान-प्रदान: सांस्कृतिक आदान-प्रदान और समझ को बढ़ावा देना आवश्यक है। पुराने जमाने में एक दूजे के धार्मिक स्थल पर बैठना उठना होता था। मंदिर, मस्जिद ,गिरजाघर और गुरुद्वारा घृणा के स्थल नहीं माने जाते थे और आज भी नहीं है। मैं समझाता हूं कि एक दूसरे के शास्त्र को पढ़ना समझना बिल्कुल बुरा नहीं। सभी धर्म को समझना ही सहिष्णुता भाव है।
  2. सांस्कृतिक शिक्षा : सांस्कृतिक शिक्षा में घृणा अपराध के बारे में जानकारी देना आवश्यक है। दुर्भाग्य से हमारे देश में पंथनिरपेक्ष शब्द का अर्थ एकदम उल्टा समझ गया और स्कूली शिक्षा में सांस्कृतिक- धार्मिक शिक्षा को एक आवश्यक बुराई माना गया। इसका नतीजा यह हुआ कि 75 वर्ष बाद भी हमारा एक निशान, एक राष्ट्रगान, एक रेलवे, एक मुद्रा, एक तिरंगा होते हुए भी एक दूसरे की संस्कृति से अपरिचित हैं। यह संविधान का अपमान है। कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका की तौहीन है। इस तरह की दकियानूसी विचारधारा को तोड़ना हम सब का कर्तव्य है।
  3. सांस्कृतिक कार्यक्रम : सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से घृणा अपराध के खिलाफ जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। कीर्तन भजन के कार्यक्रम में मुसलमान भाई आएं और कव्वाली- मुशायरा के कार्यक्रम में हिंदू भाई भी जाएं।

राजनीतिक उपाय:

  1. सख्त कानून : घृणा अपराध के लिए सख्त कानून और दंड की व्यवस्था होनी चाहिए। अभी जो कानूनी प्रावधान है, वह अपर्याप्त है। उनमें संशोधन करके इसे एक अपराध की श्रेणी में लाना चाहिए। इस तरह के अपराधी को शासकीय सेवाओं में स्थान नहीं मिलना चाहिए।
  2. राजनीतिक नेताओं की भूमिका : राजनीतिक नेताओं को घृणा अपराध के खिलाफ बोलने और लोगों को जागरूक करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। दुर्भाग्य से हमारे देश में जितने भी राजनीतिक दलों के नेता हैं, वे एक दूसरे पर जाति आधार पर अथवा धर्म के आधार पर अथवा भाषा के आधार पर अथवा प्रांत के आधार पर जहर उगलते रहते हैं। राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा इस तरह के तमाशे पर पाबंदी होना चाहिए।
  3. राजनीतिक दलों की भूमिका : राजनीतिक दलों को घृणा अपराध के खिलाफ एकजुट होना चाहिए। राजनीतिक दलों का मुख्य कार्य है जनता के बीच जाना, अपने लिए मत जुटाना और बहुमत के आधार पर सरकार का गठन करना और पारदर्शी सरकार चलाना। दुर्भाग्य से आजादी के बाद राजनीतिक दलों ने अपना मुख्य कार्य छोड़कर सारा कार्य करना शुरू कर दिया। हमारे सामने है!

कानूनी उपाय:

  1. घृणा अपराध अधिनियम: घृणा अपराध रोकने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा संविधान सम्मत विशेष अधिनियम बनाना आवश्यक है।
  2. पुलिस की भूमिका : पुलिस को घृणा अपराध के मामलों में तेजी से कार्रवाई करनी चाहिए। दुर्भाग्य से हमारे राज्यों की पुलिस इस तरह के अपराध को अपराधी नहीं मानती है। जबकि वास्तविक रूप में देखा जाए तो यह एक गंभीर अपराध जो मानवता के विरुद्ध है।
  3. न्याय व्यवस्था : न्याय व्यवस्था को घृणा अपराध के मामलों में तेजी से न्याय देना चाहिए। आज का बच्चा-बच्चा जानता है कि हमारे देश की न्याय व्यवस्था संविधान की अनुरूप नहीं है। दिन प्रतिदिन दिए जा रहे निर्णय से तो ऐसा लगता है कि न्याय व्यवस्था केवल अमीरों के लिए है। अमीरों के लिए न्यायालय रात में भी खुल जाता है। ऐसा नहीं होना चाहिए।

इन उपायों को अपनाकर घृणा अपराध को रोकने में मदद मिल सकती है। संविधान की मनसा के अनुसार भारत का प्रत्येक नागरिक अपने उन्नति कर सकता है। मानव संसाधन का सही उपयोग हो सकता है। जैसा कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तैयार की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारत को भारत विश्व गुरु बनाने की कल्पना जो की गई है , साकार हो सकती है।

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