सोयतकलां उपखंड के तीन मण्डलों में हिन्दू सम्मेलन, 10 हजार से अधिक समाजजन जुटे | संघ के 100 वर्षों की यात्रा पर हुआ चिंतन

जनमत जागरण @ सोयतकलां ।
रविवार को सोयतकलां उपखंड के डोंगरगांव, लोहारिया एवं लालाखेड़ी मण्डलों में हिन्दू समाज को संस्कार, स्वाभिमान और संगठन के सूत्र में पिरोने के उद्देश्य से हिन्दू सम्मेलन सम्पन्न हुए। सम्मेलनों में समाज के विविध वर्गों की सहभागिता के साथ सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का सशक्त संदेश दिया गया।
डोंगरगांव मण्डल में आयोजित सम्मेलन के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इंदौर प्रांत के व्यवस्था प्रमुख श्री रुपेश जी पाल रहे। उन्होंने संघ के 100 वर्षों के विकास क्रम पर प्रकाश डालते हुए स्थापना काल की परिस्थितियों, प्रतिबंधों के दौर और संघर्षपूर्ण यात्रा का उल्लेख किया। इस अवसर पर श्रीमती पूजा पाटीदार (आचार्य, नलखेड़ा) तथा श्री गोकुल प्रसाद जी व्यास विशेष रूप से उपस्थित रहे।

लोहारिया मण्डल के सम्मेलन में कथावाचक संत श्री गजेंद्र जी व्यास (चंदन गांव) ने धर्म और संस्कृति के मूल्यों पर प्रेरक उद्बोधन दिया। कार्यक्रम में राष्ट्रीय सेविका समिति की नगर संपर्क प्रमुख श्रीमती मनीषा दुबे तथा हिन्दू सम्मेलन समिति के खंड संयोजक श्री जितेंद्र जी शर्मा की विशेष उपस्थिति रही।

- लालाखेड़ी मण्डल में आयोजित सम्मेलन में राम कथा मर्मज्ञ संत श्री श्याम जी दुबे (साल्याखेड़ी) ने हिन्दू संस्कृति की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर विवेकानंद स्कूल की प्राचार्य श्रीमती कविता शर्मा तथा जिला सद्भाव संयोजक श्री भंवरलाल जी खींची मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।

सम्मेलनों में वक्ताओं ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समय-समय पर समाज की आवश्यकता के अनुसार शिक्षा, संस्कृति, श्रमिक, विद्यार्थी और सामाजिक जागरण के क्षेत्रों में रचनात्मक भूमिका निभाई है तथा हिन्दू स्वाभिमान की रक्षा के लिए सदैव संगठित प्रयास किए हैं।
🚩 सम्मेलन में उपस्थित मातृशक्ति द्वारा समाज में पंच परिवर्तन—पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी, सामाजिक समरसता और नागरिक अनुशासन—का आह्वान किया गया। कार्यक्रम का समापन भारत माता की आरती एवं समरसता भोज के साथ हुआ।
एक पंगत में बैठा समाज : समरसता का जीवंत उदाहरण

तीनों सम्मेलनों में कार्यक्रम के समापन के पश्चात सभी वर्गों और समुदायों के समाजजन एक साथ बैठकर सामूहिक भोजन में सहभागी बने। बिना किसी भेदभाव के समान आसन पर किया गया यह भोजन सामाजिक सद्भाव, समरसता और समानता का जीवंत प्रतीक रहा। यह दृश्य इस बात का सशक्त संदेश देता है कि जब समाज साथ बैठता है, साथ भोजन करता है, तभी पंच परिवर्तन का भाव व्यवहार में उतरता है और सशक्त, संगठित तथा संस्कारित समाज की दिशा तय होती है।



