झालावाड़ मेडिकल कॉलेज में दुर्लभ ऑपरेशन की सफलता: तीन वर्षीय बच्चे की दो भागों में बंटी रीड की हड्डी को जोड़ा

जनमत जागरण @ झालावाड़। कभी-कभी चिकित्सा विज्ञान भी उम्मीद का नया अध्याय लिख देता है।चिकित्सा जगत में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज करते हुए झालावाड़ मेडिकल कॉलेज के न्यूरो सर्जरी विभाग ने जन्मजात दुर्लभ बीमारी से पीड़ित तीन वर्षीय बच्चे की दो भागों में बंटी रीड की हड्डी का सफल ऑपरेशन कर नया उदाहरण प्रस्तुत किया है। करीब छह घंटे तक चले इस जटिल ऑपरेशन के बाद चिकित्सकों की टीम ने बच्चे की स्पाइनल कॉर्ड को जोड़कर उसे सामान्य जीवन की दिशा में नई उम्मीद दी है। न्यूरो सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. रामसेवक योगी के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने यह साबित किया कि समर्पण, ज्ञान और टीमवर्क से बड़े से बड़ा मेडिकल चमत्कार भी संभव है।यह सफलता न केवल एक बच्चे के जीवन में नई रोशनी लाई है, बल्कि क्षेत्रीय चिकित्सा सेवाओं की क्षमता का भी प्रमाण है।
भवानीमंडी (झालावाड़) निवासी तीन वर्षीय दिव्यांश जन्म से ही एक दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त था। उसकी रीड की हड्डी टेढ़ी-मेढ़ी होने के साथ ही दो भागों में विभाजित थी। जन्म के समय से ही माता-पिता को इस बीमारी की जानकारी थी और उन्होंने कोटा व जयपुर के कई विशेषज्ञ डॉक्टरों से परामर्श भी लिया, लेकिन सामाजिक कुरीतियों और ऑपरेशन के भय के कारण वे उपचार का निर्णय नहीं ले पाए।

समय के साथ-साथ बच्चे की कमर की टेढ़ापन बढ़ता गया। अंततः परिजनों ने झालावाड़ मेडिकल कॉलेज के न्यूरो सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. रामसेवक योगी से संपर्क किया। उन्होंने बीमारी की गंभीरता और इलाज न कराने से होने वाले संभावित दुष्परिणामों के बारे में परिजनों को विस्तार से समझाया, जिसके बाद परिवार ऑपरेशन के लिए तैयार हो गया।
करीब छह घंटे तक चले जटिल ऑपरेशन में चिकित्सकों की टीम ने दो भागों में बंटी रीड की हड्डी और स्पाइनल कॉर्ड को सफलतापूर्वक जोड़कर एक किया। ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा और बच्चे की स्थिति अब स्थिर बताई जा रही है।
दुर्लभ बीमारी, हजार में दो मामलों में ही मिलती है
डॉ. रामसेवक योगी ने बताया कि इस तरह की बीमारी को डबल कॉर्ड सिंड्रोम (डायस्टेमेटोमायलिया टाइप-1) कहा जाता है, जो अत्यंत दुर्लभ होती है। लगभग एक हजार नवजात शिशुओं में से केवल दो में ही यह जन्मजात समस्या देखने को मिलती है। यदि समय पर इलाज न कराया जाए तो ऐसे बच्चों के दोनों पैरों में स्थायी अपंगता आ सकती है।

उन्होंने बताया कि इस बीमारी का एकमात्र इलाज सर्जरी है, लेकिन ऑपरेशन अत्यंत जटिल होने के कारण कई अभिभावक जोखिम के कारण निर्णय लेने से हिचकते हैं। ऑपरेशन के दौरान विशेष न्यूरो मॉनिटरिंग की आवश्यकता होती है, जो बहुत कम अस्पतालों में उपलब्ध होती है। सीमित संसाधनों के बावजूद झालावाड़ मेडिकल कॉलेज में टीमवर्क के दम पर ऐसे जटिल ऑपरेशन सफलतापूर्वक किए जा रहे हैं।
पूरी मेडिकल टीम का रहा योगदान
इस ऑपरेशन में न्यूरो सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. रामसेवक योगी के नेतृत्व में एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष डॉ. राजन नंदा की टीम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
साथ ही सर्जिकल आईसीयू और ऑपरेशन थिएटर स्टाफ का भी विशेष योगदान रहा। टीम में
डॉ. राम अवतार मालव,
डॉ. संजीव चोपड़ा,
डॉ. ज्योति काबरा,
डॉ. साहिल राजा अंसारी,
डॉ. अल्तमस खान,
डॉ. असद,
स्टाफ सदस्य कीर्ति मित्तल, कन्हैया और मुकेश सांवरिया शामिल रहे।
समय पर जांच से बच सकती है गंभीर बीमारी
डॉ. योगी के अनुसार इस तरह की रीढ़ की हड्डी से जुड़ी कई जन्मजात बीमारियों का पता गर्भावस्था के दौरान सोनोग्राफी से लगाया जा सकता है। जन्म के बाद यदि किसी बच्चे की कमर टेढ़ी दिखाई दे, चलने में देरी हो या पैरों की गति सामान्य से कम हो, तो तुरंत किसी न्यूरो सर्जन से परामर्श लेना चाहिए।
उन्होंने यह भी सलाह दी कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को फोलिक एसिड की गोलियां नियमित रूप से लेनी चाहिए, जो सरकार द्वारा आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से नि:शुल्क उपलब्ध करवाई जाती हैं।



