लेखक : राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
दिल्ली जंतर मंतर आंदोलन इन दिनों केवल छात्र विरोध का विषय नहीं रह गया है, बल्कि लोकतंत्र, राष्ट्रीय सुरक्षा, सूचना युद्ध और सामाजिक उत्तरदायित्व के व्यापक विमर्श का केंद्र बन चुका है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक जैसी घटनाओं ने लाखों युवाओं के भविष्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाया है। वर्षों की मेहनत, परिवारों की उम्मीदें और युवाओं का विश्वास जब बार-बार टूटता है, तब उनका आक्रोश स्वाभाविक है। इस पीड़ा को कोई भी संवेदनशील समाज अनदेखा नहीं कर सकता। यदि कोई युवा अपने भविष्य की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण ढंग से आवाज उठाता है, तो लोकतंत्र उसे पूरा अधिकार देता है। वहीं सरकार की भी यह जिम्मेदारी है कि वह दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई कर युवाओं का विश्वास बनाए रखे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्पष्ट कहा है कि पेपर लीक जैसा अपराध अक्षम्य है और दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। यह केवल एक प्रशासनिक घोषणा नहीं, बल्कि उन करोड़ों युवाओं के विश्वास को पुनर्स्थापित करने का संदेश है जो अपने परिश्रम के बल पर भविष्य बनाना चाहते हैं। किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी उसका युवा वर्ग होता है और यदि उसकी मेहनत पर संगठित अपराध प्रहार करें तो पूरे समाज को उसके विरुद्ध खड़ा होना चाहिए।
किन्तु इसी के साथ एक दूसरा और कहीं अधिक गंभीर प्रश्न भी हमारे सामने खड़ा होता है। क्या युवाओं की वास्तविक पीड़ा को कुछ ऐसे तत्व अपने व्यापक राजनीतिक, वैचारिक या अन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग करने का प्रयास कर रहे हैं जिनका लक्ष्य समस्या का समाधान नहीं बल्कि असंतोष को स्थायी संघर्ष में बदल देना है? यही वह प्रश्न है जिस पर पूरे समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
लोकतंत्र और आंदोलन की संवैधानिक मर्यादा
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ विरोध, असहमति और आंदोलन का संवैधानिक अधिकार प्रत्येक नागरिक को प्राप्त है। लेकिन लोकतंत्र का अर्थ अराजकता नहीं होता। आंदोलन का उद्देश्य समाधान होना चाहिए, टकराव नहीं; संवाद होना चाहिए, हिंसा नहीं; जनहित होना चाहिए, राष्ट्रहित के विरुद्ध वातावरण तैयार करना नहीं। जब कोई आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटककर समाज में वैमनस्य, घृणा, धार्मिक अपमान, हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था को चुनौती देने लगे, तब यह केवल राजनीतिक विषय नहीं रह जाता बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाता है।
दिल्ली जंतर मंतर आंदोलन की पृष्ठभूमि
हाल के दिनों में दिल्ली जंतर मंतर आंदोलन को लेकर विभिन्न समाचार माध्यमों, राजनीतिक दलों और सार्वजनिक मंचों पर अनेक गंभीर आरोप सामने आए हैं। कहीं भड़काऊ नारों की चर्चा हुई, कहीं धार्मिक आस्थाओं के अपमान के आरोप लगे, कहीं सुरक्षा बलों के साथ टकराव की बातें सामने आईं और कहीं यह आशंका व्यक्त की गई कि कुछ संगठित समूह आंदोलन की दिशा बदलने का प्रयास कर रहे हैं। इन सभी आरोपों की सत्यता का निर्धारण केवल सक्षम जांच एजेंसियाँ और न्यायिक प्रक्रिया ही कर सकती हैं। इसलिए आवश्यक है कि हर आरोप की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच हो तथा दोषी चाहे किसी भी विचारधारा, संगठन या दल से जुड़ा हो, उसके विरुद्ध समान रूप से कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
क्या सूचना युद्ध का नया दौर शुरू हो चुका है?
आज का युग केवल सीमाओं पर लड़े जाने वाले युद्ध का नहीं है। सूचना, दुष्प्रचार, सोशल मीडिया, मनोवैज्ञानिक प्रभाव और डिजिटल नैरेटिव भी आधुनिक संघर्ष के महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। अनेक देशों में यह देखा गया है कि सोशल मीडिया अभियानों, भ्रामक सूचनाओं और संगठित प्रचार के माध्यम से समाज को विभाजित करने, संस्थाओं पर अविश्वास बढ़ाने तथा जनमत को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। इसलिए किसी भी बड़े आंदोलन के दौरान वायरल वीडियो, सोशल मीडिया संदेश और उत्तेजक प्रचार सामग्री को अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं है। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह तथ्य और अफवाह के बीच अंतर करना सीखे।मतभेद हो सकते हैं, विचार अलग हो सकते हैं, सरकारों की आलोचना भी हो सकती है, लेकिन भारत की अखंडता, संविधान की गरिमा और समाज की एकता किसी भी राजनीतिक बहस से ऊपर हैं।
अंततः प्रश्न केवल इतना नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारे निर्णय भारत को अधिक मजबूत बना रहे हैं या अधिक विभाजित? क्या हमारे आंदोलन समाधान की ओर ले जा रहे हैं या स्थायी टकराव की ओर? क्या हमारे शब्द समाज में विश्वास पैदा कर रहे हैं या अविश्वास? इन प्रश्नों के उत्तर ही भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा तय करेंगे।
राष्ट्र पहले, राजनीति बाद में
आज विश्व भारत को एक उभरती हुई आर्थिक, सामरिक और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में देख रहा है। ऐसे समय में देश के भीतर सामाजिक विश्वास, लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और राष्ट्रीय एकता को बनाए रखना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक, प्रत्येक सामाजिक संगठन, प्रत्येक राजनीतिक दल और प्रत्येक पत्रकार की भी जिम्मेदारी है। मतभेद हो सकते हैं, विचार अलग हो सकते हैं, सरकारों की आलोचना भी हो सकती है, लेकिन भारत की अखंडता, संविधान की गरिमा और समाज की एकता किसी भी राजनीतिक बहस से ऊपर हैं।
अंततः प्रश्न केवल इतना नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारे निर्णय भारत को अधिक मजबूत बना रहे हैं या अधिक विभाजित? क्या हमारे आंदोलन समाधान की ओर ले जा रहे हैं या स्थायी टकराव की ओर? क्या हमारे शब्द समाज में विश्वास पैदा कर रहे हैं या अविश्वास? इन प्रश्नों के उत्तर ही भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा तय करेंगे।
राष्ट्र किसी सरकार से बड़ा है। राष्ट्र किसी राजनीतिक दल से बड़ा है। राष्ट्र किसी आंदोलन से भी बड़ा है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी विजय तब होगी, जब असहमति भी संविधान की मर्यादा में व्यक्त होगी, आंदोलन भी राष्ट्रहित से प्रेरित होंगे, न्याय भी निष्पक्ष होगा और युवा किसी के हाथ का मोहरा नहीं, बल्कि भारत के उज्ज्वल भविष्य के निर्माता बनेंगे। राष्ट्र पहले, राजनीति बाद में—यही भारत की लोकतांत्रिक चेतना का शाश्वत मंत्र है।
लेखक: वरिष्ठ पत्रकार, समसामयिक विषयों के विश्लेषक एवं संपादक – जनमत जागरण



