अरे शोषकों… : श्रम, शोषण और सामाजिक विषमता पर करारा प्रहार करती कवि गोपाल केसर की ओजस्वी कविता| साहित्य विशेष | जनमत जागरण
मेहनतकश वर्ग की पीड़ा, शोषण और सामाजिक असमानता को बेबाक शब्दों में व्यक्त करती एक विचारोत्तेजक काव्य रचना।

जनमत जागरण | साहित्य विशेष
अरे शोषकों…
श्रम, शोषण और सामाजिक विषमता पर करारा प्रहार करती कवि गोपाल केसर की ओजस्वी कविता
लेखक/कवि : गोपाल केसर, खेड़ावदा
हर युग में साहित्य ने समाज का दर्पण बनने के साथ-साथ अन्याय के विरुद्ध स्वर भी बुलंद किया है। प्रस्तुत कविता “अरे शोषकों…” उसी परंपरा की एक सशक्त अभिव्यक्ति है। कवि गोपाल केसर ने अपने तीखे शब्दों के माध्यम से उन लोगों से प्रश्न किया है, जिन्होंने श्रमिकों के श्रम से वैभव के महल खड़े किए, लेकिन उनके जीवन की पीड़ा और अभावों की कभी सुध नहीं ली।
कविता केवल आर्थिक असमानता का चित्रण नहीं करती, बल्कि यह संवेदनहीनता, सामाजिक अन्याय और मानवीय मूल्यों के क्षरण पर भी गहरा प्रहार करती है। कवि का आक्रोश उन हाथों के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है, जिनकी मेहनत से समाज रोशन हुआ, पर जिनके अपने घर अंधेरे में डूबे रहे।
रेशम से गोदाम भरने वाले श्रमिकों को कफन तक न मिलना, और जिनकी मेहनत से दुनिया जगमगाई, उनके घरों में दीपक तक न जलना—ये पंक्तियाँ पाठक के मन को झकझोर देती हैं। कविता अंततः समाज को यह सोचने के लिए विवश करती है कि विकास तभी सार्थक है, जब उसमें श्रमिक का सम्मान और न्याय भी शामिल हो।
“अरे शोषकों…” केवल एक कविता नहीं, बल्कि श्रम की गरिमा, सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदना का सशक्त घोष है।
कविता
अरे शोषकों…
जिनके खून-पसीने से, अरे शोषकों,
तुम्हारे धन के खजाने भरे पड़े,
वे भूखे रहे, जिए या मरे,
चिंता तुम्हें किसकी छू पाई है?
अरे, लक्ष्मी के सपूतो!
कैसा यह तुम्हारा छल-बल है,
कैसा यह तुम्हारा न्याय है।
जिसने रेशम से तुम्हारे गोदाम भरे,
उसे कफन भी न तुम दे सके।
जिनकी जिंदा लाश चिता में जलकर
करती रही तुम्हारी दुनिया में उजियारा,
उनकी कुटिया में दिया भी न तुम जला सके।
जली-तपी धरा की सरिता-सलिल को,
तूने चूसा, शोषण भीषण किया।
अपने स्वर्गलोक में अभियान भरे तुम,
सिंधु-कुबेर का वरदान भरे तुम।
— कवि : गोपाल केसर, खेड़ावदा

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