1997 से 2026 : छात्र आंदोलन से शिक्षा मंत्रालय तक, धर्मेंद्र प्रधान के निर्णय ने भारतीय लोकतंत्र को क्या संदेश दिया?
NEET विवाद, छात्र आंदोलन, लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और युवाओं के भविष्य के बीच शिक्षा मंत्री के निर्णय का संवेदनशील राष्ट्रीय विश्लेषण।

विशेष विश्लेषण – लेखक : राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
भारत में शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि करोड़ों युवाओं के सपनों, परिवारों की आशाओं और राष्ट्र के भविष्य की आधारशिला है। एक प्रतियोगी परीक्षा में बैठा विद्यार्थी केवल प्रश्नपत्र हल नहीं कर रहा होता, वह अपने जीवन की दिशा तय कर रहा होता है। ऐसे में यदि परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं, तो केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि व्यवस्था पर जनता का विश्वास भी प्रभावित होता है।
यही कारण है कि जब भी पेपर लीक, परीक्षा अनियमितता या चयन प्रक्रिया को लेकर विवाद सामने आता है, तो उसका प्रभाव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और राष्ट्रीय स्तर पर महसूस किया जाता है।
इतिहास का एक रोचक संयोग है कि 1997 में परीक्षा व्यवस्था के मुद्दों पर सक्रिय छात्र आंदोलनों में भाग लेने वाले नेताओं में एक नाम धर्मेंद्र प्रधान का भी रहा। उस समय वे छात्र राजनीति के एक सक्रिय चेहरे थे। संघर्ष, आंदोलन और लोकतांत्रिक विरोध के बीच उनका सार्वजनिक जीवन आगे बढ़ा। लगभग तीन दशक बाद वही व्यक्ति देश के शिक्षा मंत्री के रूप में एक ऐसे दौर में खड़ा दिखाई देता है, जब परीक्षा प्रणाली को लेकर व्यापक बहस छिड़ी हुई है।
लोकतंत्र की यही विशेषता है कि जो कभी व्यवस्था से प्रश्न पूछता है, समय आने पर उसी व्यवस्था की जवाबदेही भी उसे निभानी पड़ती है।
किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में विरोध का अधिकार संविधान प्रदत्त है। विद्यार्थी अपनी बात रखें, सरकार से प्रश्न पूछें और सुधार की मांग करें—यह लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। किंतु उतना ही आवश्यक यह भी है कि जनभावनाओं का उपयोग ऐसे तत्व न करें जिनका उद्देश्य समस्या का समाधान नहीं, बल्कि अस्थिरता या राजनीतिक लाभ हो। जब किसी आंदोलन में विभिन्न वैचारिक, राजनीतिक या अन्य हित समूह सक्रिय हो जाते हैं, तब वास्तविक छात्र हित कहीं पीछे छूट जाने का खतरा भी पैदा हो सकता है।
भारत की युवा शक्ति विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति है। यदि यह शक्ति भ्रम, निराशा या भटकाव का शिकार होती है, तो उसका प्रभाव केवल वर्तमान पर नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य पर भी पड़ता है। इसलिए किसी भी सरकार, विपक्ष, सामाजिक संगठन और छात्र नेतृत्व की पहली जिम्मेदारी यह होनी चाहिए कि युवाओं का विश्वास बना रहे और उनकी ऊर्जा राष्ट्र निर्माण में लगे।
इसी संदर्भ में शिक्षा मंत्री के निर्णय को केवल राजनीतिक घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यदि किसी मंत्री को यह लगता है कि उसके पद पर बने रहने से विवाद का समाधान कठिन हो रहा है, जबकि पद छोड़ने से व्यवस्था पर जनता का विश्वास पुनर्स्थापित करने में सहायता मिल सकती है, तो इसे लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के एक दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है। लोकतंत्र में कभी-कभी व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण संस्था का विश्वास होता है।
यह भी विचारणीय है कि किसी भी परीक्षा विवाद का स्थायी समाधान केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार है। सुरक्षित परीक्षा प्रणाली, डिजिटल निगरानी, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता, समयबद्ध जांच, दोषियों पर कठोर दंड और पारदर्शी चयन प्रक्रिया ही युवाओं का विश्वास लौटा सकती है। यदि इन सुधारों की दिशा में ठोस कदम उठते हैं, तभी किसी भी निर्णय का वास्तविक महत्व सिद्ध होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत का युवा स्वयं भी विवेकपूर्ण दृष्टि अपनाए। लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग अवश्य करे, परंतु किसी भी प्रकार की अपुष्ट सूचना, भ्रामक प्रचार या ऐसे प्रयासों से सावधान रहे जो उसकी वास्तविक समस्याओं को पीछे छोड़कर उसे किसी अन्य उद्देश्य का माध्यम बना दें। राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी उसका जागरूक युवा है, और उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका विवेक।
1997 से 2026 तक की यह यात्रा केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक यात्रा नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र के उस चक्र की कहानी है, जहाँ आंदोलन करने वाला व्यक्ति कभी व्यवस्था का हिस्सा बनता है और फिर उसी व्यवस्था के प्रति उत्तरदायी भी ठहराया जाता है। यही लोकतंत्र की कसौटी है—सत्ता केवल अधिकार नहीं देती, वह उत्तरदायित्व भी मांगती है।
अंततः इतिहास नेताओं को केवल उनके पदों से नहीं, बल्कि उनके निर्णयों से याद रखता है। यदि किसी भी निर्णय का अंतिम उद्देश्य युवाओं का विश्वास बनाए रखना, शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाना और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना है, तो उसका मूल्य तत्कालीन राजनीतिक बहस से कहीं अधिक व्यापक हो जाता है।
भारत की शक्ति उसकी युवा पीढ़ी है। उस शक्ति को निराशा नहीं, विश्वास चाहिए; टकराव नहीं, अवसर चाहिए; और सबसे बढ़कर ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जिस पर हर विद्यार्थी बिना किसी संशय के भरोसा कर सके। यही किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक सफलता और राष्ट्रहित की सबसे बड़ी कसौटी है। लेखक – वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं संपादक – जनमत जागरण



