सोयतकलां जलझूलनी एकादशी: कंठाल नदी में उतरे 3 दर्जन से अधिक देव विमान, महाआरती ने मोहा मन
तीन महाआरतियां, तीन दर्जन से अधिक देव विमान और कंठाल नदी में जल विहार—सोयतकलां की जलझूलनी एकादशी बनी आस्था का अद्भुत उत्सव।

जलझूलनी एकादशी पर सोयतकलां में उतरा आस्था का सागर
तीन महाआरतियों से श्री बालकृष्ण का महाभिषेक, तीन दर्जन से अधिक देव-विमानों के सामूहिक दर्शन और कंठाल नदी में देव-विमानों का जल विहार बना अविस्मरणीय दृश्य
जनमत जागरण @ सोयतकलां | संवाददाता निकुंज कुमरावत
जब भक्ति ने धारण किया उत्सव का विराट रूप
“जहां आस्था केवल मंदिर की चौखट तक सीमित न रहे, बल्कि पूरा नगर ही भगवान की भक्ति में डूब जाए, वहां उत्सव केवल पर्व नहीं रहता—वह लोकजीवन की जीवंत आध्यात्मिक परंपरा बन जाता है।”
सोयतकलां में जलझूलनी एकादशी का पर्व इसी जीवंत परंपरा का ऐसा अद्भुत उदाहरण है, जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं। मंगलवार को नगर में ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ, मानो श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं साकार होकर नगर की गलियों में उतर आई हों।
वर्षों से चली आ रही इस अनूठी परंपरा के अंतर्गत नगर के विभिन्न मंदिरों में विराजित श्री बालकृष्ण के तीन दर्जन से अधिक बाल विग्रहों को आकर्षक देव-विमानों में विराजित कर सामूहिक रूप से नगर भ्रमण कराया गया। हजारों श्रद्धालुओं ने एक ही स्थान पर इतने बाल स्वरूपों के दर्शन किए तो वातावरण श्रद्धा, भक्ति और उल्लास से भर उठा।
यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सोयतकलां की सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक आस्था का विराट उत्सव बन चुका है।
तीन महाआरतियों ने बनाया दिव्य वातावरण
जलझूलनी एकादशी महोत्सव का शुभारंभ शाम करीब 3 बजे हुआ। देव-विमानों को सर्वप्रथम छत्री चौक पर विराजित किया गया, जहां श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना की।
इसके बाद सभी देव-विमानों को नगर के मध्य स्थित माधव चौक ले जाया गया। यहां आयोजित भव्य कार्यक्रम में तीन महाआरतियों के माध्यम से श्री बालकृष्ण का महाअभिषेक किया गया।
महाआरती के समय माधव चौक श्रद्धालुओं से खचाखच भर गया। महिला, पुरुष, युवा और बच्चे—हर कोई भगवान के बाल स्वरूप के सामूहिक दर्शन के लिए उमड़ पड़ा। घंटियों की ध्वनि, जय श्रीकृष्ण के जयघोष और भजन-कीर्तन से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।
एक साथ तीन दर्जन से अधिक बाल विग्रहों के दर्शन
जलझूलनी एकादशी की सबसे बड़ी विशेषता यहां होने वाले सामूहिक देव-दर्शन हैं। वर्ष में एक बार नगर के विभिन्न मंदिरों के बाल विग्रह एक साथ देव-विमानों में विराजित होकर श्रद्धालुओं के बीच आते हैं।
इस अवसर पर नगरवासियों को एक ही स्थान पर तीन दर्जन से अधिक मंदिरों के श्री बालकृष्ण के दर्शन प्राप्त हुए। श्रद्धालुओं ने देव-विमानों की पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामनाएं भगवान के श्रीचरणों में अर्पित कीं।
भक्ति और लोकपरंपरा का यह संगम सोयतकलां को एक अलग धार्मिक पहचान प्रदान करता है।
शिवसेना की महाआरती और सदाबहार ग्रुप की महाप्रसादी
माधव चौक पर शिवसेना द्वारा भव्य महाआरती का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में नगर परिषद अध्यक्ष प्रतिनिधि पुष्करराज सिंह जादौन, मंडल अध्यक्ष अमित नागर, अतिथि सुरेश सिंह सोनगरा , शिवसेना के प्रमोद व्यास , पार्षदगण, अन्य जनप्रतिनिधि व नगर के अनेक वरिष्ठजन उपस्थित रहे।
वहीं छत्री चौक पर सदाबहार ग्रुप द्वारा श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसादी का आयोजन किया गया। खिचड़ी सहित अन्य प्रसाद श्रद्धालुओं में वितरित किया गया।
धार्मिक आयोजन में सामाजिक संगठनों की सहभागिता ने इसे सामूहिकता का स्वरूप प्रदान किया।
कंठाल नदी में हुआ देव-विमानों का जल विहार
महोत्सव का सबसे आकर्षक और भाव-विभोर कर देने वाला दृश्य तब सामने आया, जब भजन-कीर्तन करते हुए सभी देव-विमान पवित्र कंठाल नदी की ओर पहुंचे।
नदी तट पर पुनः भगवान की आरती की गई। इसके पश्चात परंपरानुसार देव-विमानों को कंठाल नदी के जल में तैराया गया।
जल की लहरों के बीच सजे हुए देव-विमानों का यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए किसी दिव्य अनुभूति से कम नहीं था। चारों ओर भजन-कीर्तन, जयघोष और भगवान श्रीकृष्ण के नाम का संकीर्तन—ऐसा वातावरण बना कि श्रद्धालु स्वयं को इस आध्यात्मिक दृश्य का हिस्सा मानकर धन्य अनुभव करते रहे।
इसके बाद भजन-कीर्तन करते हुए देव-विमान पेड़ियाघाट स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर पहुंचे। यहां सामूहिक महाआरती के साथ पुनः भगवान का पूजन-अभिषेक किया गया। इसके पश्चात सभी देव-विमान अपने-अपने मंदिरों की ओर रवाना हुए।
आतिशबाजी ने बांधा समापन का अद्भुत रंग
जलझूलनी एकादशी की इस दिव्य यात्रा के दौरान नगर परिषद द्वारा साफ-सफाई, विद्युत सज्जा और सुरक्षा सहित व्यापक व्यवस्थाएं की गईं।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर स्टाप डेम के समीप नगर परिषद द्वारा की गई भव्य रात्रिकालीन आतिशबाजी ने आसमान को रोशनी से भर दिया। नदी, देव-विमान, रोशनी और आतिशबाजी का यह संगम देर रात तक लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहा।
श्रद्धालुओं ने इस दृश्य को अपनी आंखों में संजो लिया। यह क्षण निश्चित रूप से सोयतकलां की जलझूलनी एकादशी की स्मृतियों में लंबे समय तक जीवित रहेगा।
सुरक्षा व्यवस्था रही चाक-चौबंद
महोत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी को देखते हुए प्रशासन और पुलिस की ओर से सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए।
राजस्व विभाग के अधिकारी-कर्मचारी, थाना प्रभारी रामगोपाल वर्मा, यशवंत राव गायकवाड सहित आगर पुलिस प्रशासन के जवान व्यवस्थाओं में तैनात रहे। नदी क्षेत्र में किसी प्रकार की अप्रिय स्थिति न बने, इसके लिए बाढ़ सुरक्षा दल भी देर रात तक मौजूद रहा।
अधिकारियों ने कार्यक्रम स्थल पर पहुंचकर व्यवस्थाओं का जायजा लिया और श्रद्धालुओं की सुविधा एवं सुरक्षा सुनिश्चित की।
सात से आठ हजार श्रद्धालु बने साक्षी
शाम 3 बजे से प्रारंभ हुआ यह महोत्सव रात करीब 10 बजे तक चला। आयोजन में अनुमानतः सात से आठ हजार श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
पूरे नगर में निकली देव-विमानों की शोभायात्रा के दौरान घर-घर और मार्गों पर श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का पूजन किया। महिलाओं ने आरती उतारी और श्रद्धालुओं ने भगवान के समक्ष अपनी मनोकामनाएं रखीं।
क्यों मनाई जाती है जलझूलनी एकादशी?
धार्मिक लोकपरंपराओं में जलझूलनी एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी मान्यताओं के साथ यह पर्व भगवान के जल-विहार और बाल स्वरूप की आराधना से जुड़ा हुआ है।
सोयतकलां में इसी आस्था को लोकपरंपरा का स्वरूप देते हुए भगवान श्री बालकृष्ण के विग्रहों को देव-विमानों में विराजित कर नदी तक ले जाने और जल विहार कराने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है।
मालवा की धरती पर सोयतकलां की अनूठी पहचान
सोयतकलां का जलझूलनी एकादशी महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भक्ति, परंपरा, सामाजिक सहभागिता और लोकसंस्कृति का विराट संगम है।
एक साथ तीन दर्जन से अधिक बाल विग्रहों का नगर भ्रमण, हजारों श्रद्धालुओं द्वारा सामूहिक दर्शन, तीन महाआरतियां, भजन-कीर्तन के बीच कंठाल नदी में देव-विमानों का जल विहार, नीलकंठ महादेव मंदिर में सामूहिक आरती और फिर स्टाप डेम पर आकाश को रोशन करती आतिशबाजी—इन सभी दृश्यों को एक साथ देखने का अवसर विरल है।
यही कारण है कि सोयतकलां की जलझूलनी एकादशी केवल सोयतकलां का पर्व नहीं रह जाती, बल्कि मालवा की लोकआस्था और सनातन सांस्कृतिक परंपरा की एक ऐसी जीवंत झलक बन जाती है, जिसकी स्मृति लंबे समय तक श्रद्धालुओं के मन में बनी रहती है।
सार्थक चिंतन
मंदिरों से निकले बालकृष्ण जब पूरे नगर के बीच पहुंचे और कंठाल के जल में देव-विमानों ने जल विहार किया, तब सोयतकलां ने यह संदेश दिया कि परंपराएं केवल इतिहास का हिस्सा नहीं होतीं—जब समाज उन्हें श्रद्धा और सहभागिता से जीवित रखता है, तो वे आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कृति की धरोहर बन जाती हैं।

फोटो कैप्शन
- सोयतकलां में माधव चौक पर जलझूलनी एकादशी के अवसर पर आयोजित महाआरती का अद्भुत दृश्य।
- देव-विमानों के साथ भजन-कीर्तन करते श्रद्धालु।
- कंठाल नदी में जल विहार करते देव-विमानों का मनोहारी दृश्य।
- श्रद्धालुओं को महाप्रसादी के रूप में खिचड़ी वितरित करते सदाबहार ग्रुप के कार्यकर्ता।
- स्टाप डेम के समीप नगर परिषद द्वारा की गई भव्य रात्रिकालीन आतिशबाजी का अद्भुत दृश्य।











