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विश्ववंदिता संस्कृत माता| भारत की तुम भाग्य विधाता ||

जनमत जागरण न्यूज़ @नलखेड़ा
संस्कृत एक भाषा या एक विषय नहीं है बल्कि यह भाषाओं की जननी है। संस्कृत के बिना संस्कृति नहीं रहेगी । हमें आज संस्कृत को बचाने की जरूरत पड़ रही है, जबकि आज से हजारों वर्ष पहले संस्कृत ही एकमात्र भाषा थी । इसी भाषा में वेद, महाग्रंथ लिखे गए । हाई स्कूल धरोला के शिक्षक दिनेश त्रिवेदी ने जनमत जागरण के एक साक्षात्कार में कहा कि संस्कृत भारत की ही नहीं बल्कि विश्व की भाषा है । यह परमात्मा प्रदत्त पवित्र भाषा है। संस्कृत में मानव को महामानव बना देने की क्षमता है। बस इसे दैनिक जीवन में उपयोग करने की जरूरत है। त्रिवेदी ने कहा कि संस्कृत को नजरअंदाज कर हम अपनी ही भारतीय संस्कृति से खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा संस्कृत चालीसा की रचना की गई है ।





