संस्कृत में शोध कार्य करने वाली वंदना को मिली पीएचडी की उपाधि
वंदना ने कहा -शोध का मूल प्रयोजन -डॉ राधा बल्लभ त्रिपाठी जी की कल्पना संस्कृति-संस्कार से संपन्न हो समाज को साकार करना

जनमत जागरण न्यूज @ इंदौर
आज के समय में संस्कृत पढ़ने वालों की संख्या कम हो रही है, लोगों का झुकाव अंग्रेजी की तरफ हो रहा है। ऐसे में संस्कृत में शोध कार्य करना और पीएचडी की उपाधि प्राप्त करना एक सराहनीय प्रयास है।
मध्य प्रदेश के आगर जिले के शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सोयतकलां की शिक्षिका वंदना प्रजापति सुपुत्री नंदकिशोर प्रजापति ग्राम विकास अधिकारी निवासी झालावाड़ को कोटा विश्वविद्यालय द्वारा संस्कृत विषय में पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर एक अनुकरणीय उदारहण पेश किया है। नौकरी के साथ-साथ उन्होंने अध्ययन भी जारी रखा। हम सभी जानते हैं कि हमारे मौलिक ग्रंथ संस्कृत में हैं, उनमें वर्णित ज्ञान परंपरा तभी सामने आ सकती है जब संस्कृत में अध्ययन हो, शोधकार्य हो। वन्दना द्वारा पीएचडी के लिए संस्कृत भाषा का चयन करना उत्साहवर्धक तो है ही साथ ही संस्कृत के क्षेत्र में संभावनाओं को भी रेखांकित करता है। आज यह आवश्यक है कि वन्दना की तरह अन्य लोग भी संस्कृत में अध्ययन व शोधकार्य करने की पहल करें ताकि वास्तविकता का अनुसंधान किया जा सके।
नाटकों से समाज की विसंगतियों का हो समाधान विषय पर किया शोध
वन्दना ने मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के निवासी संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान डॉ राधा वल्लभ त्रिपाठी जी के नाटकों में सामाजिक परिशीलन विषय पर इन्होंने अपना शोध कार्य पूर्ण किया । उन्होंने ने अपने शोध में बताया है कि आचार्य राधा वल्लभ त्रिपाठी जी का नाट्य साहित्य सामाजिक सरोकार को नई दिशा वह दृष्टि देने वाला है जिसमें सर्वजन सुखाय का भाव निहित है। वन्दना वर्तमान में मध्य प्रदेश के आगर जिले के शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सोयतकलाां मे शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं । वंदना ने अपना शोध कार्य राजकीय महाविद्यालय झालावाड़ की संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ अलका बागला के निर्देशन में पूर्ण किया है ।
वंदना प्रजापति का कहना है कि जितना प्राचीन सनातन धर्म है उतना ही प्राचीन संस्कृत है। भारत के दो आधार स्तम्भ है भारतीय संस्कृति और देवभाषा संस्कृत, इस बदलते दौर के साथ संस्कृत को विशेष संरक्षण की जरूरत है इसके लिऐ सभी को विशेष ध्यान देना होगा तभी संस्कृत का संरक्षण ,संवर्धन एवं विकास होगा और जन जन की भाषा बनकर अपने पुराने गौरव को पुन: प्राप्त कर पायेगी ।
शोध का मूल प्रयोजन संस्कृति संस्कार से संपन्न हो समाज
जनमंगल हेतु समाज की विसंगतियों का समाधान करने का दिव्य पथ आचार्य जी के नाटकों के अध्ययन से फलित होता है, नारी चेतना व संस्कृति संस्कार से संपन्न समाज की उनकी कल्पना साकार हो शोध का मूल प्रयोजन यही है । वंदना ने बताया की इस शोध के माध्यम से संस्कृत को कर्मकांड की भाषा मानने वालों के दुराग्रह का निराकरण भी हो सकेगा व उनकी सोच को विस्तार मिलेगा इस शोध के द्वारा साहित्य भाषा वह संस्कृति के प्रवाह में बाधक वैचारिक और क्रियात्मक शक्तियों का विश्लेषणात्मक शोध हो सकेगा जिससे सामाजिक परिदृश्य में नवीन आलोक पुंज प्रसारित होगा।



