मां बगलामुखी मंदिर: दर्शन मात्र से हो जाते है कष्ट दूर, यहाँ पूजा करने से मिलता है ,विजय प्राप्ति का आशीर्वाद
नव रात्रि के इस पवन पर्व पर आज हम आपको नलखेड़ा मे स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ माँ बगुलामुखी मंदिर के बारे में बताएंगे, दर्शन मात्र से हो जाते है , कष्ट दूर
जनमत जागरण न्यूज @ नलखेड़ा
नवरात्रि के दिनों में माहौल भक्तिभय हो जाता है। जगह-जगह मंदिरों में लंबी कतारे लग जाती हैं, लोग माता के दर्शन कर उनका आर्शीवाद लेना चाहते हैं। नवरात्रि के इस पावन अवसर पर आज हम आपको नलखेड़ा में स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां बगलामुखी मंदिर के बारे में बताएंगे। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में दर्शन करने से भक्तों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।
अब बात करते हैं
तीन मुख वाली मां बगलामुखी मंदिर के बारे में। कहा जाता है कि ये मंदिर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर से 100 किलोमीटर दूर ईशान कोण में आगर मालवा जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर नलखेड़ा में लखुन्दर नदी के तट पर पूर्वी दिशा में विराजमान है।
मान्यता तो ये भी है कि महाभारत काल में यहीं से पांडवों को विजय श्री का वरदान प्राप्त हुआ था। कहा जाता है कि महाभारत काल में पांडव जब विपत्ति में थे तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें मां बगलामुखी के इस स्थान की उपासना करने करने के लिए कहा था। उस समय मां की मूर्ति एक चबूतरे पर विराजमान थी। मान्यता है कि पांडवों ने इस त्रिगुण शक्ति स्वरूपा की आराधना कर विपत्तियों से मुक्ति पाई और अपना खोया हुआ राज्य वापस पा लिया।
मंदिर में विराजित हैं त्रिशक्ति मां
मंदिर में त्रिशक्ति मां विराजित हैं। मध्य में मां बगलामुखी, दाएं मां लक्ष्मी तथा बाएं मां सरस्वती हैं। नवरात्र पर्व के दौरान यहां देश के कई स्थानों के साथ ही विदेशों से भी माता भक्त लाखों की संख्या में आते हैं, जो अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए विशेष हवन-अनुष्ठान यहां करते हैं। मां भगवती बगलामुखी का महत्व समस्त देवियों में सबसे विशिष्ट है। शास्त्र के अनुसार इस देवी की साधना-आराधना से शत्रुओं का स्तंभन हो जाता है। यह साधक को भोग और मोक्ष दोनों ही प्रदान करती है।
ऐसी मान्यता है कि सिद्धिदात्री मां बगलामुखी के दाएं ओर धनदायिनी महालक्ष्मी और बाएं ओर विद्यादायिनी महासरस्वती विराजमान हैं। विश्व में इनके सिर्फ तीन ही महत्वपूर्ण प्राचीन मंदिर हैं, जिन्हें सिद्धपीठ कहा जाता है। उनमें से एक है नलखेड़ा में मां बगलामुखी मंदिर। भारत में मां बगलामुखी के तीन ही प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर माने गए हैं जो क्रमशः दतिया (मध्यप्रदेश), कांगड़ा (हिमाचल) तथा नलखेड़ा जिला आगर मालवा (मध्यप्रदेश) में हैं। तीनों का अपना अलग-अलग महत्व है।
द्वापर युगीन यह मंदिर अत्यंत चमत्कारिक है। यहां देशभर से शैव और शाक्त मार्गी साधु-संत तांत्रिक अनुष्ठान के लिए आते रहते हैं। यह बहुत ही प्राचीन मंदिर है। सन् 1815 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था। इस मंदिर में लोग अपनी मनोकामना पूरी करने या किसी भी क्षेत्र में विजय प्राप्त करने के लिए यज्ञ, हवन या पूजन-पाठ कराते हैं।
अहम बात ये है कि मां बगलामुखी की इस चमत्कारी मूर्ति की स्थापना का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिला है। मान्यता है कि ये मूर्ति स्वयं सिद्ध स्थापित है। काल गणना के हिसाब से यह स्थान करीब पांच हजार साल से भी पहले से स्थापित है। बगलामुखी की यह प्रतिमा पीताम्बर स्वरूप की है। इसी कारण यहां पीले रंग की सामग्री चढ़ाई जाती है। जैसे कि पीला कपड़ा, पीली चूनरी, पीला प्रसाद और पीले फूल।
नगर में स्थित विश्व प्रसिद्ध पीतांबरा सिद्धपीठ मां बगलामुखी मंदिर में शक्ति और शक्तिमान के सम्मिलित प्रभाव से की जाने वाली साधना-आराधना अनंत गुना फल की प्राप्ति होती है। जब कभी शत्रु का भय हो तो बगलामुखी की साधना-आराधना आराधक को फलदायी रहती है। वहीं मां की आराधना से शत्रु का स्तंभन भी होता है। बगलामुखी मंदिर महाभारतकालीन है। यहां पांडवों ने भगवान कृष्ण के कहने पर मां की आराधना कर विजयश्री का वरदान प्राप्त किया था।
मां बगलामुखी का वर्णन कालीपुराण में मिलता है। वर्ष की शारदेय और चौत्र नवरात्र में मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है। साथ ही दोनों नवरात्र में तंत्र साधना के लिए तांत्रिकों का जमावड़ा भी यहां लगा रहता है।
72 फीट ऊंचा दीप स्तंभ

मंदिर में कई देवी-देवताओं का वास है। अहाते में स्थित काल भैरव की चमत्कारी मूर्ति स्थापित है। मंदिर के अहाते में ही वीर हनुमान, राधाकृष्ण व महाकाल मंदिर भी स्थित है। सिद्धपीठ मां बगलामुखी नलखेड़ा इतिहास के झरोखे में दीप स्तंभ उज्जैन स्थित मां हरसिद्धि मूर्ति के सम्मुख निर्मित है। यहां 72 फीट ऊंचा दीप स्तंभ बना हुआ है, जो विशेष अवसरों पर जगमगाता है।
उल्लेखनीय है कि दीप स्तंभ अति प्राचीन मंदिरों में ही पाए जाते हैं। सम्राट विक्रमादित्य की आराध्या मां हरसिद्धि के मंदिर की प्रतिकृति इस मंदिर के गर्भगृह की दीवारों की लगभग पांच फीट चौड़ाई एवं कारीगरी भी इस बात के प्रमाण हैं कि यह मंदिर ईसा से एक शताब्दी पूर्व सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल में निर्मित हुआ होगा। निसंदेह मंदिर निर्माण के पूर्व यहां स्वंयभू मूर्ति रही होगी। यहां लखुंदर नदी प्राचीन नाम लक्ष्मणा मंदिर परिसर के पृष्ठ भाग की दीवार से सटकर बहती है। मानों माता के चरणो को पखारने के लिए ही वह यहां प्रवाहित हो रही है।
मनोकामनाएं होती हैं पूर्ण
मंदिर प्रांगण में बिल्व पत्र, चम्पा, सफेद आंकड़ा, आंवला, नीम एवं पीपल के पूजनीय वृक्ष भी स्थित हैं। ये मां के साक्षात होने का प्रमाण देते हैं। प्राचीन काल में संत साधक पुरुष समाधि द्वारा अपनी देह का त्याग करते थे। ज्ञात रहे कि यहां ऐसी सत्रह समाधियां बनी हुई हैं। प्रसिद्ध बल्डावदा हनुमान मंदिर भी इसी क्षेत्र में स्थित है। मुख्य पुजारी गोपालदास पंडाजी ने बताया कि मां भगवती सभी की मनोकामना पूर्ण करती हैं। नवरात्र के इन दिनों में निसंतान दंपतियों की गोद भराई की रस्म की जाती है। इस मंदिर की पिछली दीवार पर पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए स्वास्तिक बनाने का भी प्रचलन है। भक्तों का मानना है कि मनोकामनाओं की पूर्ति यहां होती है। मंदिर परिसर में हवन कुंड है जिसमें आम और खास सभी भक्त अपनी आहुति देते हैं। अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किए जाने वाले इस हवन में पीली सरसों, हल्दी, कमल गट्टा, तिल, जौ, घी, नारियल आदि का होम किया जाता है। मान्यता है कि माता के इस मंदिर में हवन करने से सफलता के अवसर दोगुने हो जाते है।



