आस्था

परशुराम जयंती विशेष : अमूल्य विरासत है टांगीनाथ धाम

आज भी सुरक्षित है दुनिया में तबाही मचाने वाला भगवान परशुराम का फरसा

जनमत जागरण न्यूज @ झारखण्ड

जी हां, भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम का फरसा झारखंड के रांची से 150 किलोमीटर और गुमला से 70 किलोमीटर दूर घने जंगलों में स्थित एक जगह है , टांगीनाथ धाम। स्थानीय भाषा में फरसा को टांगी बोला जाता है. इसलिए इस जगह का नाम टांगीनाथ धाम पड़ गया। इस जगह पर आज भी भगवान परशुराम के पदचिह्न मौजूद हैं। यहां वे भगवान शिव की स्थापना कर और बगल में अपना फरसा गाड़ कर तपस्या किये थे। यही जगह आज का टांगीनाथ धाम है।

फरसे में आज भी नहीं लगा जंग

यहाँ पर गड़े लोहे के फरसे की विशेषता यह है कि हज़ारों सालों से खुले में रहने के बावजूद इस फरसे पर ज़ंग नही लगी है। और दूसरी विशेषता यह है कि ये जमीन मे कितना नीचे तक गड़ा है इसकी भी कोइ जानकारी नहीं है। एक अनुमान 17 फ़ीट का बताया जाता है। यहां से थोड़ी दूर एक पर्वत की चोटी पर भगवान शिव का त्रिशूल भी धंसा हुआ है। इसलिए कुछ लोग टांगीनाथ धाम के फरसे को शिव का त्रिशूल भी मानते हैं।

पुरातत्व विभाग ने करवायी थी 1989 में खुदाई

हम अपनी ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों के प्रति कितने लापरवाह है, टांगीनाथ धाम इसका एक जीता – जागता उदाहरण है। यहाँ पर सैकड़ों की संख्या मे प्राचीन शिवलिंग और मूर्तियां बिखरी पड़ी है लेकिन उनके रख रखाव और सुरक्षा का यहां कोई प्रबन्ध नहीं है। इनकी ऐसी स्तिथि देखकर यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि अब तक कितनी पुरासम्पदा गलत हाथोँ मे जा चुकी होगी। टांगीनाथ में स्थित प्रतिमाएं उत्कल के भुवनेश्वर, मुक्तेश्वर व गौरी केदार में प्राप्त प्रतिमाओं से मेल खाती है।
पुरातत्व विभाग ने टांगीनाथ धाम में जब खुदाई की थी, तब खुदाई में उन्हें सोने चांदी के आभूषण सहित अनेक मूल्यवान वस्तुएं मिली थीं। लेकिन कुछ कारणों से यहां पर खुदाई बन्द कर दी गयी और फिर कभी यहां पर खुदाई नहीं की गयी। खुदाई में हीरा जड़ीत मुकुट, चांदी का अर्धगोलाकार सिक्का, सोने का कड़ा, कान की सोने की बाली, तांबे की बनी टिफिन जिसमें काला तिल व चावल रखा था, आदि चीजें मिलीं थीं। यह सब चीज़ें आज भी डुमरी थाना के मालखाना में रखी हुई है। अब संदेह में डालने वाली और आश्चर्य चकित करने वाली बात यह है कि जब वहां से इतनी बहुमूल्य चीजें मिल रही थीं तो आखिर क्यों वहां पर ख़ुदाई बन्द कर दी गयी? हो सकता है कि वहां पर और खुदाई की जाती या आज भी की जाये तो हमें टांगीनाथ के बारे में कुछ नई जानकारी प्राप्त हो सकती है।

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