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महाकाली-महालक्ष्मी- मां सरस्वती तीनों रूपों में विराजित है आदिशक्ति मां चौसठ

जनमत जागरण न्यूज़ @ सोयत कलां

मध्यप्रदेश तथा राजस्थान राज्य की सीमा पर बसा सोयतकलां नगर इन दिनों नवरात्रि के अवसर पर माँ की भक्ति में लीन है।    देश में चौसठ माता के तीन मंदिर बतायें जाते है। सोयतकलां का मां चौसठ योगिनी मंदिर  इन्हीं में से एक है। जबकि दो अन्य उज्जैन और कोलकाता में स्थित है। इसी दृष्टि से सोयतकलां की अलग ही पहचान है। नवरात्र के दिनों में निन्यानवे नदियों का संगम कहलाने वाली कालीसिंध तथा जीवनदायिनी कंठाल नदी के किनारे विंध्य पर्वतमाला पर विराजित चौसठ माता के दर्शन से पापों से मुक्ति मिलती है। यहां नवरात्रि के दिनों में साधक अपनी साधना के बल पर सिद्धियां प्राप्त करते है।
     कंठाल नदी के किनारे स्थित यह मंदिर प्राचीनतम सिद्धपीठ माना जाता है। इस अतिप्राचीन मंदिर में महाकाली, महालक्ष्मी तथा सरस्वती की तीन मूर्तियां स्थापित है। बताया जाता है कि प्रतापी महापुरुषो की साधना के फलस्वरूप मूर्तियों यहाँ स्थापित हुई थी । यहां पर मां चौसठ रूपों में विराजमान है। महाकाली, महालक्ष्मी तथा मां सरस्वती के पीछे शेष मूर्तियां विराजित है  जानकारी के अनुसार चौसठ योगिनी मंदिर उज्जैन, कोलकाता के अलावा सोयतकलां में स्थित है। यहां पर नियमित आने वाले भक्तों का कहना है कि भावनात्मक रूप से नियमित दर्शन करने से शरीर में तेज आ जाता है जिसके कारण तन मन कंपित हो उठता है ।

चमत्कारों का साक्षी है मां चौसठ का मंदिर

बुजुर्ग बताते हैं कि लगभग 22 वर्ष पूर्व जब पं. स्व. विष्णु नागर और गोपाल व्यास मंदिर में नवरात्रि का अनुष्ठान कर रहे थे, तभी एक पुत्री अपने पिता को मरणासन्न अवस्था में मंदिर लाई और मां के सामने लिटा दिया। यह दृश्य देखकर दोनों पुजारी अचंभित हो गए ,लेकिन माता के मंत्रों से सिद्ध जल व्यक्ति पर छिड़कते ही वह उठ बैठे । आज भी मां के दरबार में कई चमत्कार दिखाई देते है। दशहरे के दिन राजपूत समाज के लोग यहां पारंपरिक वेशभूषा में पूजा अर्चना करते है। मां चौंसठ के मंदिर में वर्षों से धार्मिक अनुष्ठान एक ही परिवार द्वारा संपन्न कराए जा रहे हैं। स्व. देवीलाल नागर से प्रारंभ हुई इस परंपरा को आज श्यामसुंदर नागर निभा रहे है। नागर परिवार द्वारा विशेष कार्यसिद्धि के लिए यहां अनुष्ठान किए जाते हैं। यहां कार्यसिद्धि के लिए बलि की परंपरा भी रही है। अष्टमी और विजयादशमी के दिन राजपूत समाज के लोग अपनी पारम्परिक वेशभूषा में मां चौसठ की विधि-विधान से आराधना करते हैं इसके बाद नगरवासी से पूजा के बाद नगर के सारे लोग मां चौसठ की पूजा-अर्चना करते है। नवरात्रि के दौरान यहां प्रतिदिन पूजा अर्चना के उपरांत मां के दरबार में मां चौसठ भक्त मंडल द्वारा आकर्षक गरबों की प्रस्तुतियां होती है

आपदाओं से रक्षा करती हैं मां चौसठ

       लोक मान्यता है कि वर्षा काल में रौद्र रूप धारण कर तबाही मचाने वाली कंठाल नदी सहित अन्य प्राकृतिक आपदाओं से माँ चौसठ ही नगर और नागरिकों की रक्षा करती है।

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