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☝️चुनाव में ‘नोटा’ का विकल्प: प्रजातंत्र प्रेमियों के लिए संवैधानिक भरोसा तोड़ने की साज़िश ?👇✍️डॉ बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’

जनमत जागरण @ आपके लेख: 
☝️चुनाव में 'नोटा' का विकल्प: प्रजातंत्र प्रेमियों के लिए संवैधानिक भरोसा तोड़ने की साज़िश ?👇
✍️डॉ बालाराम परमार 'हॅंसमुख'
भारत में 'प्रजातन्त्र' एक ऐसी शासन प्रणाली है, जिसके अन्तर्गत जनता अपनी स्वेच्छा से निर्वाचन में आए हुए किसी भी उम्मीदवार को मत देकर अपना प्रतिनिधि चुन सकती है। 'लोकतन्त्र', शासन का एक ऐसा रूप है,जिसमें शासकों का चुनाव लोग करते हैं। उससे केन्द्र और राज्य में विधायिका बनती है। लोकतन्त्र दो शब्दों से मिलकर बना है, "लोक + तन्त्र"। अर्थात जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन।
🔵 लोकतंत्र की बदौलत नागरिक सरकार चलाने के लिए अपना नेतृत्व चुनते हैं। लोकतंत्र जाति, धर्म या लिंग की परवाह किए बिना नागरिकों को समान अधिकारों की गारंटी देता है। 26 जनवरी 1950 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने 21 तोपों की सलामी के साथ ध्वजारोहण कर भारत को पूर्ण गणतंत्र घोषित किया और तब से अब तक भारत संसदीय लोकतांत्रिक गणराज्य है।
🧿 'पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज' द्वारा दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान 2009 में भारत के निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 'मतदाता को मतपत्र पर "उपर्युक्त में से कोई नहीं", विकल्प प्रदान करने से किसी भी अयोग्य उम्मीदवार को नकारने की आजादी होगी'। इस याचिका पर निर्णय देते समय सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव में सुधार की दृष्टि से आदेश पारित करते हुए आशा व्यक्त की थी : "उपरोक्त में से कोई नहीं"; 'यानी मतदाताओं के लिए विकल्प की शुरुआत से चुनाव में व्यवस्थित परिवर्तन होगा और राजनीतिक दलों को स्वच्छ उम्मीदवारों को टिकट देने के लिए मजबूर किया जाएगा'। यह पवित्र आशा अधूरी रह गई और नोटा का दुरुपयोग होना शुरू हो गया।
🔵 चुनाव आयोग के इस प्रावधान की वस्तु स्थिति यह है कि 'अभी तक "नोटा" केवल प्रतीकात्मक है। नोटा में वोटों की कोई भी संख्या चुनाव के परिणाम को प्रभावित नहीं करती है। अर्थात नोटा को बहुमत मिल भी जाए , फिर भी चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार पर इसका कोई असर नहीं पड़ता है। आम जनता की समझ के लिए उदाहरण दिया जा सकता है कि यदि एक विधानसभा अथवा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में कुल 100 मतदाता है और तीन उम्मीदवार चुनाव मैदान में है। अब मान लिजिए कि सेवाराम नाम के उम्मीदवार को 30 वोट मिलते हैं तथा बालाराम और गंगाराम नाम के उम्मीदवार को 10-10 वोट मिलते हैं और इस चुनाव क्षेत्र में नोटा अर्थात उपरोक्त में से कोई नहीं का बटन 50 मतदाताओं ने दबाया। कायदे से तो इस क्षेत्र में चुनाव निरस्त कर फिर से चुनाव करना करवाना चाहिए। लेकिन ऐसा न होते हुए 30 मत प्राप्त करने वाले उम्मीदवार विजय घोषित किया जाता है।
🧿👉और यहीं से शुरुआत होता है धोखाधड़ी या वोट का दुरुपयोग रोकने के लिए और असंतोष और अस्वीकृति का विकल्प देने के प्रावधान के नाम पर प्रजातंत्र के साथ घिनौना मजाक। और यह मजाक बदस्तूर 2013 से चला रहा है। किसी भी संवैधानिक संस्था : व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका ने इस पर पुनर्विचार करने का नहीं सोचा !!
मतदाता को यह जानना जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय एवं चुनाव आयोग ने राज्यसभा चुनाव, ग्राम पंचायत एवं नगरीय निकाय चुनाव में नोटा की अनुमती नहीं दी है। यहां नोटा का विकल्प न रखने के पीछे तर्क यह दिया गया है कि 'नोटा' का विकल्प न केवल लोकतंत्र की शुद्धता को काम करेगा बल्कि यह भ्रष्टाचार और दल बदल के शैतान को भी बढ़ावा देगा'!! कितनी सोची समझी चालाकी से लोगों की आंखों में धूल झोंक कर - एक म्यान में दो तलवारें रख दी !!
🔵 संवैधानिक प्रावधान का अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि अनुच्छेद 326 के अनुसार सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को निर्वाचित सरकार के सभी स्तरों के चुनावों और जनमत संग्रह में वोट देने का अधिकार है। जाति, पंथ, आर्थिक स्थिति, धर्म या लिंग के आधार पर किसी को भी इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। समानता के मौलिक अधिकार को उचित ठहरने के लिए सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की गारंटी दी गई है। इस संदर्भ में मेरा स्पष्ट मत है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव में नोटा का प्रावधान लाकर लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति को कमजोर करने का षड्यंत्र है। यदि नोटा वास्तव में 'असंतोष और अस्वीकृति करने का विकल्प है' तो फिर इसे अन्य चुनाव निकायों में भी लागू किया जाना चाहिए !!
🧿 'उपरोक्त में से कोई नहीं' यह तो मतदाता किसी भी स्तर पर नापसंद कर सकता है। यहां तक की राज्यसभा सदस्य के चुनाव में भी राजनीतिक दल अपना उम्मीदवार खड़ा करते हैं तो जरूरी नहीं है कि उस दल के सांसद या विधायक मतदाता उसे पसंद करते हों !!अभी हाल ही के राज्यसभा चुनाव में हिमाचल प्रदेश की घटना इसका उदाहरण हो सकती है !! और मेरे विचार की पुष्टि करती है !!
🔵 2014 में छत्तीसगढ़ में 5.04 प्रतिशत अर्थात 38772 लोगों ने नोटा का उपयोग किया। इसी वर्ष तमिलनाडु के नीलगिरी में 4.99% अर्थात 46559 और उड़ीसा के नवरंगपुर में 4.34 प्रतिशत अर्थात 44408 लोगों ने नोटा को चुना। 2019 के लोकसभा चुनावों में लगभग 1.04 प्रतिशत अर्थात कुल मतदान का लगभग आधा करोड़ से ज्यादा लोगों ने नोटा का उपयोग किया। 2019 में ही वाराणसी में 21 प्रत्याशियों को नोटा से भी काम मत मिले। वहां 4000 लोगों ने नोटा का उपयोग किया। समझ में नहीं आता कि इन 4000 लोगों को नरेंद्र मोदी जैसा व्यक्ति भी पसंद नहीं आया ?
🧿 मतदाताओं एवं बुद्धिजीवी वर्ग कृपया गंभीरता से चिंतन करें कि यह नोटा प्रजातंत्र के लिए एक मजाक नहीं तो और क्या है ? भारत के मतदाताओं को पूर्व राष्ट्रपति डॉ प्रणव मुखर्जी के शब्दों का स्मरण कराया जाता है कि "लोकतंत्र एक उपहार नहीं है, बल्कि हर एक भारतवासी के लिए एक पवित्र भरोसा है। जिसके अंतर्गत जनता अपनी स्वेच्छा से लोकतंत्र में खुद से सुधार करने की विलक्षण योग्यता है।"
🔵 मतदाता आत्म मंथन करें और मतदान करते समय सोचें की उनके विचारों का सही उपयोग हो। लोकतंत्र के प्रहरी बनें। प्रजातंत्र के निर्मल नभ को धुमिल होने से बचाएं। लोकतंत्र में मतदान का महत्व है। अपना मत व्यर्थ न जाने दें।

चुने अपना कोई एक मन मनपसंद उम्मीदवार।
तभी तो होगा प्रजातंत्र का बेड़ा पार।।
भारत में संसदीय लोकतंत्र का है व्यवहार।
जागरूक मतदाता का व्यर्थ न हो मताधिकार।।

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