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“साधना का पूर्ण विराम: जब हजारों की श्रद्धा ने विदाई दी एक महान संत को” _ पढ़ें “समाधि की गौरव गाथा”

⏩ जब संत दर्शन सागर ने साधना को मोक्ष में बदला ◾ सुसनेर में जैन संत ने समाधिमरण से साधना को दिया अंतिम मोक्ष

जनमत जागरण @ सुसनेर से दीपक जैन ।“जब तक सूरज चांद रहेगा, दर्शन सागर जी का नाम रहेगा” की गूंज और धर्म पताकाओं से सुसज्जित नगर ने सोमवार को दिगम्बर जैन संत पूर्वाचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज को उनके समाधि मरण पर भावपूर्ण विदाई दी। हजारों मुनिभक्तों की उपस्थिति में डोल यात्रा निकाली गई, जिसने पूरे सुसनेर को भक्ति, शांति और श्रद्धा के वातावरण से भर दिया।

साधना की अंतिम मंजिल: संलेखना से समाधिरविवार को दिगम्बर जैन संत ने संलेखना व्रत का पालन करते हुए समाधिमरण प्राप्त किया। यह जैन साधकों की अंतिम साधना मानी जाती है, जिसमें संयम और समता के साथ जीवन का त्याग किया जाता है। उनके निधन के बाद, त्रिमूर्ति मंदिर में सोमवार को विधिविधान से अंतिम संस्कार किया गया।

शहर की सड़कों पर उमड़ा श्रद्धा का सैलाब :सुबह 9 बजे त्रिमूर्ति मंदिर से शुरू हुई डोल यात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से गुजरती हुई वापस त्रिमूर्ति मंदिर पहुंची। सफेद वस्त्रों में पुरुष और केसरिया साड़ी में महिलाएं नवकार मंत्र का जाप करते हुए शामिल हुईं। बैंड बाजे के बीच भक्तगण “हर माँ का बेटा कैसा हो, दर्शन सागर जैसा हो” जैसे जयकारे लगाते रहे।

जैन परंपरा में मृत्यु: मोक्ष का महोत्सव :जैन धर्म में देह त्याग को महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। पंडित नितिन झांझरी ने बताया, “मृत्यु को विजय माना जाता है, क्योंकि यह मोक्ष प्राप्ति की राह खोलती है। समाधि मरण, साधना का सर्वोच्च रूप है।” संत की अंतिम विदाई के इस महोत्सव में मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश और दिल्ली सहित कई स्थानों से श्रद्धालु शामिल हुए।

युवाओं ने दिखाया सेवा का जज्बा: कड़कड़ाती ठंड में समाज के युवाओं ने पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ आयोजन की सभी व्यवस्थाएं संभालीं। नगर को धर्म पताकाओं और संत के पोस्टरों से सजाया गया।

समाधि मरण की शिक्षाएं और भावनाएं : दर्शन सागर जी महाराज के देह त्याग ने समाज को संयम, समता और साधना की महत्ता सिखाई। उनके समाधि मरण से पूरा क्षेत्र शोकाकुल है, पर उनके उत्कृष्ट समाधि मरण से सभी के मन में हर्ष और गर्व का भाव भी है।

👉 “संसार असार है, मृत्यु शाश्वत सत्य है।” – इस भावना को आत्मसात कर दर्शन सागर जी ने अपनी साधना को पूर्णता दी और मोक्ष के पथ पर अग्रसर हुए।

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