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“नीमच में जैन मुनियों पर हमले के विरोध में सुसनेर में सकल जैन समाज की रैली, राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन”


“मुनियों के चरणों पर पड़ी हिंसा की परछाई – अब मौन नहीं, न्याय चाहिए!”

सुसनेर से विशेष रिपोर्ट | रिपोर्टर: दीपक जैन

मध्यप्रदेश के नीमच जिले में जैन संतों पर हुए कायरतापूर्ण हमले की चिंगारी अब जनआक्रोश की ज्वाला बन चुकी है। जिस धर्म ने पूरी मानवता को ‘अहिंसा परमो धर्म:’ का अमर मंत्र दिया, उसी के तपस्वियों पर हमला – यह केवल एक समाज पर नहीं, भारतीय संस्कृति की आत्मा पर आघात है।

सुसनेर में गुरुवार को सकल जैन समाज के श्रद्धालुओं, मुनिभक्तों और युवाओं ने मिलकर एक ओजस्वी बाइक रैली निकाली। ‘जब तक सूरज-चांद रहेगा, मुनियों का सम्मान रहेगा’, ‘संतों पर हमला करने वालों को फांसी दो’ जैसे गगनभेदी नारों ने आसमान को भी झकझोर दिया। शुक्रवारिया चौराहे से रैली प्रारंभ होकर रेस्ट हाउस पहुँची, जहाँ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के नाम संबोधित ज्ञापन तहसीलदार विजय सेनानी को सौंपा गया।

ज्ञापन का वाचन करते हुए समाज के वरिष्ठ अशोक जैन ‘मामा’ की आवाज में पीड़ा और आग्रह दोनों साफ सुनाई दे रहे थे। उन्होंने बताया कि 13 अप्रैल की रात, सिंगोली के समीप कछोला ग्राम के हनुमान मंदिर में विश्राम कर रहे साधुओं पर लूट और हिंसा की नापाक कोशिश की गई। आश्चर्य की बात यह है कि यह अमानवीय कृत्य एक ऐसे मंदिर में हुआ, जो स्वयं सनातन धर्म के पवित्र आराध्य हनुमानजी को समर्पित है। यह केवल अपराध नहीं, अपवित्रता है।

जैन संत कोई संपत्ति नहीं रखते, न ही किसी भौतिक संग्रह में विश्वास करते हैं। वे पदविहार करते हैं, व्रत-नियम में जीवन जीते हैं। ऐसे संतों पर हमला, केवल उनके शरीर पर नहीं, हमारे समाज की आत्मा पर हमला है। यह घटना समूचे समाज को सवालों के कठघरे में खड़ा करती है – क्या हम इतने असंवेदनशील हो गए हैं?


‘सार्थक चिंतन’: जब संतों की सुरक्षा नहीं, तो फिर किसका भविष्य सुरक्षित?

जिस धरती ने भगवान महावीर को जन्म दिया, उस धरती पर आज उन्हीं के अनुयायियों को सुरक्षा की गुहार लगानी पड़ रही है – यह दृश्य हृदय को विदीर्ण करता है। हमें यह आत्ममंथन करना होगा कि हम किस दिशा में जा रहे हैं? क्या अब संतों के पदचिह्न भी असुरक्षित हैं?

जैन समाज की यह मांग पूरी तरह उचित है कि पदविहार के दौरान संतों को सुरक्षा मिले। लेकिन इससे भी अधिक जरूरी है नैतिक सुरक्षा – समाज की मानसिकता का परिष्कार। यह केवल कानून से नहीं, संस्कारों से होगा।


‘सार्थक दृष्टिकोण’: जैन धर्म पर आघात नहीं, भारतीयता पर हमला है

यह हमला सिर्फ जैन धर्म के मुनियों पर नहीं हुआ, यह हमारे ‘भारत’ के उस मूल विचार पर प्रहार है, जहाँ ‘अतिथि देवो भवः’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे सिद्धांत सांसों की तरह चलते हैं।

यह घटना उस समाज के लिए भी चेतावनी है जो अब तक यह सोचता रहा कि धर्म के प्रतिनिधियों को कोई छू नहीं सकता। आज आवश्यकता है जागने की, सजग होने की, और संतों के चरणों की सुरक्षा को राष्ट्रीय सम्मान का विषय बनाने की।


निष्कर्ष: मौन अब महापाप है

यह समय मौन का नहीं, सार्थक प्रतिरोध का है। जैन समाज ने जिस अनुशासित, अहिंसक और गरिमामय तरीके से विरोध दर्ज कराया, वह स्वयं में एक उदाहरण है। शासन-प्रशासन को चाहिए कि इस घटना की निर्दलीय जांच कर दोषियों को कड़ी सजा दिलाए तथा भविष्य में ऐसे संतों के पदचिह्नों पर केवल श्रद्धा की छाया हो – भय की नहीं।


✍️ संपादकीय प्रस्तुति: राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
संपादक – जनमत जागरण न्यूज़ पोर्टल
“जहाँ पीड़ा मौन हो, वहाँ कलम को स्वर बनना ही पड़ता है।”


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