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जैव विविधता दिवस: वन विभाग का जागरूकता कार्यक्रम | पढ़ें – ‘सार्थक व्यूपॉइंट’ : क्या लुप्त होते जंगलों के बीच उत्सव या दिवस मनाना ही पर्याप्त है?”

“प्रकृति की रक्षा, भविष्य की सुरक्षा” – जैव विविधता दिवस पर वन विभाग का आयोजन

जनमत जागरण @ आगर मालवा, 22 मई।
वन विभाग द्वारा अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के अवसर पर आगर रेंज परिसर में जन-जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य आमजन को जैव विविधता (बायोडायवर्सिटी) के महत्व और संरक्षण के प्रति जागरूक करना था। कार्यक्रम में उप वनमंडलाधिकारी श्री फतेसिंह निमामा की गरिमामयी उपस्थिति रही। वन क्षेत्राधिकारी श्री लक्ष्मी नारायण चौधरी ने कहा कि –
“जैव विविधता न केवल पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह मानव जीवन की गुणवत्ता और भविष्य की सुरक्षा से भी सीधे जुड़ी है। इसकी रक्षा हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।”

कार्यक्रम का संचालन श्री पदम परमार द्वारा प्रभावशाली ढंग से किया गया।
इस दौरान जैव विविधता पर आधारित प्रश्नोत्तरी का आयोजन हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। श्रीमती लीला बाई पति केवलराम को उत्कृष्ट उत्तर देने पर पुरस्कार प्रदान किया गया।
करीब 30 से 40 लोग, जिनमें ग्रामीणजन, वनकर्मी और पर्यावरण प्रेमी शामिल थे, इस आयोजन में उपस्थित रहे और सभी ने जैव विविधता संरक्षण हेतु जन-जागरूकता फैलाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का समापन पर्यावरण संरक्षण के प्रेरणादायक संदेश के साथ किया गया।


✍️ सार्थक दृष्टिकोण: “जैव विविधता दिवस – एक दिन का जश्न या सतत जिम्मेदारी?”

< SARTHAK VIEWPOINT जैव विविधता की बातें और कटते जंगल – एक कटु यथार्थ

जैव विविधता का अर्थ क्या केवल भाषणों तक सीमित रह गया है?

“जैव विविधता” केवल वनस्पति और जीव-जंतुओं की गणना नहीं है, बल्कि यह उस पारिस्थितिक ताने-बाने का नाम है, जिसके तंतु एक-दूसरे से इतने गहराई से जुड़े हैं कि एक के नष्ट होने पर पूरी प्रणाली चरमरा जाती है। यह न केवल प्रकृति का सौंदर्य है, बल्कि हमारी भविष्य सुरक्षा का वैज्ञानिक आधार भी है।

लेकिन क्या आज इस वैज्ञानिक और मानवीय विषय को महज़ “दिवस मनाकर” निभाया जा रहा है? एक आयोजन, कुछ उद्बोधन, एक प्रश्नोत्तरी, और एक संकल्प… क्या यही जैव विविधता संरक्षण है?

सरकारी तंत्र से सवाल – क्या केवल दिवस मनाना ही कर्तव्य है?

हर वर्ष 22 मई को जैव विविधता दिवस मनाया जाता है, लेकिन क्या कभी किसी ने यह देखा है कि उसके अगले ही दिन जंगलों में क्या हो रहा होता है?
कहीं पेड़ों की कटाई, कहीं अवैध अतिक्रमण, और कहीं शहरीकरण की आरी।
आज पूरे जिले में जैव विविधता की बातें हुईं, लेकिन कहीं किसी ने ये स्वीकारा कि जंगलों का अस्तित्व अब संकट में है?

जैव विविधता संरक्षण की बात तो दरकिनार है – पहले वृक्ष ही बचा लें, तो बहुत है!
क्या ऐसे दिखावटी आयोजनों से कोई असली बदलाव संभव है?

जैव विविधता संरक्षण कैसे हो?

  • स्थानीय प्रजातियों का संरक्षण: परंपरागत फसलों, वृक्षों और प्रजातियों को पहचानकर उन्हें पुनर्जीवित करना।
  • जमीनी क्रियान्वयन: भाषणों से हटकर क्षेत्रीय संरक्षण योजनाओं को लागू करना।
  • सामुदायिक भागीदारी: वनवासी, किसान, विद्यार्थी और पंचायत – सबकी जिम्मेदारी तय हो।
  • शुद्ध नीयत, कड़े नियम: पर्यावरणीय अपराधों पर सख्त कार्रवाई और पारदर्शी कार्यप्रणाली।

अंत में – एक सार्थक प्रश्न

जब जंगल ही नहीं बचेंगे तो जैव विविधता कहाँ पनपेगी?
क्या हमें ‘दिवस मनाने’ से ज़्यादा ‘प्रकृति जीने’ की आदत नहीं डालनी चाहिए?
क्या यह समय नहीं कि हम सिर्फ भाषणों से नहीं, संरक्षण की सच्ची राह से प्रकृति की ओर लौटें?

जैव विविधता दिवस पर एक कार्यक्रम जरूरी है, पर उससे भी अधिक जरूरी है वह निरंतरता, जो वृक्ष, वन्यजीव और जलस्रोतों के संरक्षण में दिखाई दे। वरना यह दिवस भी एक सरकारी औपचारिकता बनकर रह जाएगा – और हम एक और अवसर को सिर्फ शब्दों में खो देंगे।

राजेश कुमरावत ‘सार्थक’ (वरिष्ठ पत्रकार, संपादक – जनमत जागरण, सार्थक दृष्टिकोण स्तंभ लेखक)

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