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शुक्रवारिया की सूखती उम्मीदें: 20 दिन से ट्यूबवेल बंद, नगर परिषद की नींद अभी बाकी!

20 दिन से बंद है ट्यूबवेल, नगर परिषद को सुध नहीं; गर्मी में जल संकट गहराया

जनमत जागरण @ सुसनेर।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जहाँ एक ओर प्रदेश में ‘जलगंगा संवर्धन अभियान’ के माध्यम से जल स्रोतों के पुनर्जीवन की बात कर रहे हैं, वहीं सुसनेर नगर परिषद जीवित और चालू जल स्त्रोतों को भी मृतप्राय करने में जुटी हुई है।

नगर के वार्ड क्रमांक 8, शुक्रवारिया क्षेत्र की सार्वजनिक ट्यूबवेल की मोटर करीब 20 से 25 दिन पहले खराब हो गई थी। नगर परिषद ने मोटर तो निकाल ली, लेकिन उसे ठीक कर दोबारा लगाना शायद गर्मी के बाद के मौसम के लिए सोच रखा है। तब तक रहवासियों को पानी के लिए दर-दर भटकने की आदत डाली जा रही है।


🛑 ट्यूबवेल बंद, उम्मीदें भी सूख गईं!

वार्ड क्रमांक 8 का शुक्रवारिया इलाका पिछले 20–25 दिनों से जल संकट झेल रहा है। सार्वजनिक ट्यूबवेल की मोटर तो नगर परिषद निकालकर ले गई, लेकिन फिर उसे वापस लगाने का “उत्साह” किसी की फाइलों में कहीं खो गया। न नलजल योजना से पानी आता है, न ट्यूबवेल से। ऐसे में सवाल यह नहीं कि पानी क्यों नहीं आ रहा, सवाल यह है – नगर परिषद काम कब करना शुरू करेगी?


🧊 गर्मी तेज है, सिस्टम ठंडा है

नवतपा की तपन शरीर झुलसा रही है, लेकिन नगर परिषद की कार्यशैली देखकर लगता है कि वहां शायद बर्फ की सिल्ली पर बैठकर निर्णय लिए जा रहे हैं। लोग पानी के लिए जूझ रहे हैं, मवेशियों की टंकी सूख चुकी है, लेकिन नगर के जिम्मेदारों को मानो लू से एलर्जी ही नहीं है। जब ज़रूरतें चिल्ला रही हों और व्यवस्था कान में रुई ठूंसकर बैठी हो, तो यह प्रशासन नहीं, उपेक्षा की पराकाष्ठा कहलाती है।


🌀 राजनीति गरम, समाधान ठंडे बस्ते में

नगर परिषद बनने के बाद से यहां विकास कम, विवाद ज्यादा हुए हैं। हर समस्या के पीछे कोई न कोई “राजनीतिक टेक्निकल फॉल्ट” निकल आता है। ट्यूबवेल की खराबी भी उसी राजनीति की भेंट चढ़ गई लगती है। पार्षद अपने-अपने इलाकों में निजी खर्च से ट्यूबवेल खनन करा रहे हैं, लेकिन नगर परिषद एक पुरानी मोटर तक को ठीक नहीं करवा पा रही – इसे कहते हैं “सिस्टम का साइलेंट मोड”।


🗣️ बयान वीरों की प्रशासनिक बहादुरी!

सीएमओ ओ. पी. नागर का बयान –

“मोटर निकाली गई थी, अब तक क्यों नहीं लगाई गई इसकी मुझे जानकारी नहीं है। मैं जानकारी लेकर करवाता हूं।”
यह जवाब वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर मरीज़ की मौत पर कहे – “अरे, दवाई देना भूल गया था, अभी देता हूं।” जब अधिकारी को समस्या की जानकारी ही नहीं, तो समाधान की उम्मीद किससे की जाए?

इस बयान के बाद अब यह तय करना मुश्किल हो गया है कि बड़ी समस्या – ट्यूबवेल की मोटर है या जानकारी की मोटर बंद है।


🖋️ सार्थक दृष्टिकोण

जब जनता बूंद-बूंद पानी को तरस रही हो और प्रशासन टेबल मीटिंग में व्यस्त हो, तो समझना चाहिए कि समस्या पानी की नहीं, नीयत और प्राथमिकता की है
नगर परिषद सिर्फ योजनाओं की सूची गिनाने में व्यस्त है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि एक खराब ट्यूबवेल की मोटर भी हफ्तों तक नहीं सुधरती।
यह लापरवाही नहीं, जनविश्वास से किया गया मज़ाक है।
पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा की अनदेखी, उस सोच का प्रतीक है जो विकास को फ़ाइलों में और जनता को इंतज़ार में डालकर रखती है।
अब समय है कि सवाल सिर्फ पानी का नहीं, प्रशासन की जवाबदेही का भी पूछा जाए।


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