
डॉ. बालाराम परमार ‘हँसमुख’
सेवानिवृत्त प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय संगठन।सदस्य, विद्या भारती (मध्य क्षेत्र – मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़)। सदस्य, मध्यप्रदेश पाठ्यपुस्तक निर्माण एवं देखरेख समिति, मध्यप्रदेश शासन।
जब विश्व की अनेक सभ्यताएँ अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत थीं, तब भारत में ज्ञान को केवल सूचना या कौशल नहीं, बल्कि आत्मबोध, लोकमंगल और सृष्टि के साथ सामंजस्य का माध्यम माना गया। यहाँ शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका अर्जित करना नहीं था, बल्कि जीवन को सार्थक बनाना था। इसी कारण भारतीय ज्ञान परंपरा ने वेदों, उपनिषदों, दर्शन, गणित, खगोल, आयुर्वेद, योग, व्याकरण, राजनीति, कला और अध्यात्म जैसे विविध क्षेत्रों में ऐसे सिद्धांत विकसित किए, जिनकी प्रासंगिकता आज भी विश्व स्वीकार कर रहा है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा–2023 ने इस प्राचीन ज्ञानधारा को पुनः शिक्षा की मुख्यधारा में प्रतिष्ठित करने का ऐतिहासिक प्रयास किया है। यह केवल पाठ्यक्रम परिवर्तन नहीं, बल्कि भारतीय आत्मबोध, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और ज्ञान-स्वराज की पुनर्स्थापना का अभियान है। इसका उद्देश्य अतीत की गौरवगाथा का भावनात्मक स्मरण भर नहीं, बल्कि प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच एक सशक्त सेतु निर्मित करना है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों से जुड़ी रहें और भविष्य की चुनौतियों का आत्मविश्वास के साथ सामना कर सकें।
भारतीय ज्ञान परंपरा हमें सिखाती है कि विज्ञान और अध्यात्म परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं; तकनीक और नैतिकता साथ-साथ चलें; विकास और पर्यावरण में संतुलन बना रहे; तथा व्यक्ति की उन्नति समाज और समस्त मानवता के कल्याण से जुड़ी हो। यही कारण है कि आज मानसिक स्वास्थ्य, पर्यावरण संकट, नैतिक चुनौतियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में भी विश्व की दृष्टि भारत की ज्ञान-संपदा की ओर पुनः आकर्षित हो रही है।
यह लेख भारतीय ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक यात्रा, उसके दार्शनिक आधार, वैज्ञानिक उपलब्धियों, विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक नीतियों से हुए आघात, स्वतंत्रता के बाद की चुनौतियों तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के माध्यम से प्रारंभ हुए पुनर्जागरण का समग्र शैक्षिक सिंहावलोकन प्रस्तुत करता है। साथ ही यह विचार भी रखता है कि यदि भारत को 21वीं सदी में ज्ञान-आधारित वैश्विक नेतृत्व करना है, तो उसे अपनी जड़ों से शक्ति लेकर आधुनिकता की ओर आत्मविश्वास के साथ अग्रसर होना होगा।
भारतीय ज्ञान परंपरा वास्तव में अतीत की स्मृति नहीं, वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की दिशा है।
“भारतीय ज्ञान परंपरा: एक शैक्षिक सिंहावलोकन”
- विषय प्रवेश:
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के पारित होने के बाद पिछले पांच वर्षों से शिक्षा जगत में भारतीय ज्ञान परंपरा की चर्चा पुनः केंद्र में आई है। किसी राष्ट्र की पहचान उसके भूगोल या सकल घरेलू उत्पाद से नहीं होती, उसकी पहचान उसकी ज्ञान परंपरा से होती है। ज्ञान वही शक्ति है जो मनुष्य को पशु से अलग करती है और समाज को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है।
भारतीय दृष्टिकोण में ज्ञान का अर्थ केवल तथ्यों का संग्रह नहीं है। यहाँ ज्ञान को सत्य और चेतना का अनुभव माना गया है। वेद इस परंपरा के अपौरुषेय स्रोत हैं। ऋषियों ने समाधि की अवस्था में इस ज्ञान को सुना, इसलिए इसे श्रुति कहा गया।
भारतीय ज्ञान मीमांसा में ज्ञान के दो प्रकार बताए गए हैं। अपरा विद्या अर्थात भौतिक जगत, विज्ञान, कला, समाज और अर्थव्यवस्था का ज्ञान। परा विद्या अर्थात आत्मा, परमात्मा और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का ज्ञान।
चारों वेद ज्ञान के चार आयाम प्रस्तुत करते हैं। ऋग्वेद स्तुति और प्राकृतिक शक्तियों का ज्ञान देता है। सामवेद संगीत और मंत्रोच्चारण के माध्यम से आध्यात्मिक लय सिखाता है। यजुर्वेद यज्ञ और व्यावहारिक आचार संहिता देता है। अथर्ववेद चिकित्सा, विज्ञान और दैनिक जीवन की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है।
ज्ञान प्राप्ति के साधन भी भारतीय परंपरा ने व्यवस्थित किए। प्रत्यक्ष अर्थात अनुभव। अनुमान अर्थात तर्क। आप्त वचन अर्थात विश्वसनीय गुरु का कथन। अर्थापत्ति अर्थात परिस्थिति से अर्थ निकालना। अनुपलब्धि अर्थात अनुपस्थिति का ज्ञान।
इस समग्र दृष्टि में धर्म, दर्शन, गणित, खगोल, आयुर्वेद, व्याकरण और राजनीति सभी सम्मिलित हैं। वेदों को आधार मानते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2023 ने भारतीय ज्ञान परंपरा को मुख्यधारा में लाने का संकल्प लिया है। इसका केंद्रीय उद्देश्य प्राचीन शास्त्र और समकालीन विज्ञान के बीच की दूरी समाप्त कर विद्यार्थियों को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है।
उपनिषद का उद्घोष है- ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’। और परंपरा का मूल मंत्र है ‘सा विद्या या विमुक्तये’। अर्थात विद्या वही है जो अज्ञान, भय, रोग और शोषण से मुक्ति दिलाए। भीमबेटका के 30,000 वर्ष पुराने शैलचित्र से लेकर सिंधु घाटी की नगर योजना और चंद्रयान तक यह ज्ञान धारा निरंतर प्रवाहित है।
- भारत के भाग्य विधाता और ज्ञान परंपरा के संवाहक:
कोई भी परंपरा बिना संप्रेषण के जीवित नहीं रहती। भारत के मनीषियों ने समय-समय पर इस ज्ञान धारा को नया वेग दिया।
प्राचीन काल में महर्षि व्यास ने वेदों को चार भागों में संकलित किया। वाल्मीकि ने रामायण के माध्यम से आदर्श समाज का चित्र दिया। पाणिनि ने अष्टाध्यायी में संस्कृत को विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा का रूप दिया। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में राज्य, अर्थ और नीति के सिद्धांत स्थापित किए। आर्यभट्ट ने शून्य और दशमलव प्रणाली दी। चरक और सुश्रुत ने चिकित्सा को विज्ञान बनाया।
मध्यकाल में जब भारत विदेशी आक्रमणों से जूझ रहा था, तब संतों और सुधारकों ने ज्ञान को जीवित रखा। आधुनिक काल में स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो में कहा कि भारत विश्व को अध्यात्म देगा। श्री अरविंद ने सावित्री महाकाव्य में दिव्य जीवन की कल्पना की। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा को राजनीति का आधार बनाया। रवींद्रनाथ टैगोर ने विश्वभारती में पूर्व और पश्चिम के ज्ञान का संगम किया। माधव सदाशिवराव गोलवलकर ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा दी।
स्वतंत्रता के बाद डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन को विश्व मंच पर स्थापित किया। कोठारी आयोग 1964-66 ने आधुनिक शिक्षा की नींव रखी। प्रो यशपाल ने विज्ञान को जन-जन तक पहुंचाया। प्रो जगमोहन सिंह राजपूत ने NCERT, NCTE और UNESCO में रहकर पाठ्यक्रम और शिक्षक शिक्षा को नई दिशा दी। डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने विज्ञान और स्वदेशी तकनीक में आत्मनिर्भरता का स्वप्न दिया। इन सभी ने मिलकर स्वतंत्र भारत में शिक्षा को पुष्पित और पल्लवित किया।
- भारतीय ज्ञान परंपरा का स्वरूप और आधारभूत सिद्धांत:
इस परंपरा की छह विशेषताएं इसे विश्व की अन्य परंपराओं से अलग करती हैं।
पहली समग्र दृष्टि। यहाँ शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं था। उद्देश्य था शरीर का स्वास्थ्य, मन की शांति, बुद्धि की तर्क शक्ति और आत्मा का विकास। योग इसी समग्रता का उदाहरण है। आसन शरीर के लिए, प्राणायाम मन के लिए, ध्यान आत्मा के लिए।
दूसरी ऋषि परंपरा। ऋषि का अर्थ केवल साधु नहीं। ऋषि युगदृष्टा होता है। वह अनुभव, तर्क और ध्यान तीनों से सत्य की खोज करता है। कणाद ने ध्यान में बैठकर अणु का सिद्धांत दिया। भास्कराचार्य ने गणित के सूत्र साधना से प्राप्त किए।
तीसरी गुरु-शिष्य परंपरा। प्राचीन काल में शिक्षा व्यापार नहीं थी, तपस्या थी। गुरु आश्रम में शिष्य को केवल श्लोक नहीं, चरित्र सिखाता था। तक्षशिला और नालंदा में 10,000 से अधिक छात्र विश्व भर से आते थे क्योंकि वहाँ ज्ञान के साथ संस्कार मिलता था।
चौथी लोक कल्याण। ज्ञान का उद्देश्य पद या धन नहीं था। आयुर्वेद रोग मिटाने के लिए था। वास्तु सुखी गृह के लिए था। नीति समाज को चलाने के लिए थी। इसलिए कहा गया बहुजन हिताय बहुजन सुखाय।
पांचवी प्रकृति के साथ समन्वय। भारत ने नदियों को पुण्य सलिला कहा, वृक्षों में देवता का वास देखा, पृथ्वी को माता माना। यह अंधविश्वास नहीं, पारिस्थितिकी का विज्ञान था। वसुधैव कुटुम्बकम का अर्थ भी यही है कि पूरी पृथ्वी एक परिवार है।
छठी आध्यात्मिक और दार्शनिक आधार। वेद कर्म का ज्ञान देते हैं। उपनिषद ब्रह्म का ज्ञान देते हैं। गीता कर्मयोग का ज्ञान देती है। सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत ये षड्दर्शन मानव जीवन के सभी प्रश्नों का उत्तर देते हैं।
- ज्ञान-विज्ञान के प्रमुख क्षेत्र और विश्व को भारत का योगदान:
तथ्यों के आधार पर देखें तो विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन शून्य और दशमलव प्रणाली है। इसके बिना आज का कंप्यूटर, राडार, क्रायोजेनिक इंजन और ड्रोन संभव नहीं।
आर्यभट्ट ने 5वीं शताब्दी में ही बताया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को न्यूटन से 700 वर्ष पहले लिखा।
चिकित्सा के क्षेत्र में चरक संहिता और सुश्रुत संहिता आज भी प्रमाण हैं। सुश्रुत ने 2600 वर्ष पहले प्लास्टिक सर्जरी और मोतियाबिंद का ऑपरेशन किया। योग और आयुर्वेद आज विश्व भर में स्वीकार्य हैं क्योंकि ये केवल दवा नहीं, जीवनशैली बदलते हैं। कोविड काल में काढ़ा और प्राणायाम ने लाखों लोगों के प्राणों की रक्षा की।
समाज और राजनीति में चाणक्य का अर्थशास्त्र राज्य प्रबंधन का पहला व्यवस्थित ग्रंथ है। इसमें कर व्यवस्था, गुप्तचर तंत्र और विदेश नीति का उल्लेख है। सम्राट विक्रमादित्य के काल में जनपद और ग्राम पंचायत की अवधारणा विश्व की सबसे पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था थी।
कला और भाषा में संस्कृत को कंप्यूटर के लिए सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है क्योंकि इसमें संदर्भ से अर्थ स्पष्ट होते हैं। भरत मुनि का नाट्यशास्त्र आज भी रंगमंच का आधार है। अजंता, एलोरा और कोणार्क की वास्तु आज के इंजीनियरों के लिए भी आश्चर्य है।
- भारतीय ज्ञान परंपरा का पतन: विदेशी आक्रमण और औपनिवेशिक आघात:
21वीं सदी की पीढ़ी को यह समझना आवश्यक है कि इतनी समृद्ध परंपरा का पतन क्यों हुआ। इसके तीन मुख्य कारण रहे: विदेशी आक्रमण, सांस्कृतिक विस्थापन और औपनिवेशिक नीतियां।
पहला निरंतर विदेशी आक्रमण। 550 ईसा पूर्व में फारस के दारा प्रथम ने सिंधु क्षेत्र को अपने अधीन कर आर्थिक दोहन किया। खरोष्ठी लिपि का प्रभाव यहीं से आया। 326 ईसा पूर्व में सिकंदर के आक्रमण से पश्चिमोत्तर भारत की ज्ञान परंपरा ध्वस्त हुई। बाद में शक, कुषाण और हूणों के आक्रमणों ने तक्षशिला और गांधार जैसे शिक्षा केंद्रों को नष्ट किया। इससे मौखिक परंपरा और वेद पाठ की शुद्धता टूटी।
712 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम के सिंध आक्रमण से इस्लामी शासन का आरंभ हुआ। 1000 से 1192 ईस्वी के बीच महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी के हमलों ने मंदिर, पुस्तकालय और गुरुकुल नष्ट किए। कहा जाता है कि नालंदा पुस्तकालय 6 महीने तक जलता रहा। 1398 में तैमूर ने दिल्ली में कत्लेआम कर गुरूकुलों और पुस्तकालयों को जलाया। मुगलों के बाद 1739 में नादिर शाह और 1761 में अहमद शाह अब्दाली की लूट से उत्तर भारत की ज्ञान संस्थाएं और कमजोर हुईं।
दूसरा औपनिवेशिक आघात। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने शिक्षा नीति लागू कर संस्कृत और मातृभाषा की शिक्षा बंद कर अंग्रेजी अनिवार्य की। उद्देश्य था ऐसे वर्ग का निर्माण जो रंग और रक्त से भारतीय हो पर विचार से अंग्रेज। गुरुकुल का स्थान कान्वेंट स्कूलों ने लिया। परिणामस्वरूप अगली पीढ़ियां अपनी जड़ों से कट गईं।
तीसरा ज्ञान को रोजगार से अलग करना। गुरुकुल में बढ़ई का बेटा काष्ठ कला के साथ वेद भी पढ़ता था। औपनिवेशिक व्यवस्था ने कहा कि या तो क्लर्क बनो या कारीगर। इससे हाथ के हुनर और मस्तिष्क के पोषण का संबंध टूट गया।
- आजादी के बाद भारतीय ज्ञान परंपरा पर आघात और 21वीं सदी की प्रासंगिकता:
स्वतंत्रता के बाद भी व्यवस्थित आघात के तीन रूप देखे गए।
पहला शिक्षा और पाठ्यक्रम में वामपंथी विचारधारा को बढ़ावा देकर भारतीय इतिहास और दर्शन की व्याख्या को भौतिकवादी दृष्टि तक सीमित किया गया। वेद, उपनिषद और षड्दर्शन को पाठ्यक्रम से हटाया गया।
दूसरा छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मैकाले की 1835 की शिक्षा पद्धति को जारी रखा गया। अंग्रेजी माध्यम और पश्चिमी पाठ्यक्रम को ही आधुनिक माना गया और भारतीय पारंपरिक ज्ञान को पिछड़ा कहा गया।
तीसरा भारतीय संस्कृति, सभ्यता और इतिहास की जानकारी को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया। NCERT की पुरानी पुस्तकों में सिंधु घाटी, गुरुकुल प्रणाली और भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान को कम किया गया।
आज विश्व चार बड़े संकटों से जूझ रहा है और इन सबका उत्तर भारतीय ज्ञान परंपरा में है।
पहला मानसिक स्वास्थ्य संकट। WHO की रिपोर्ट कहती है कि 2030 तक अवसाद विश्व की सबसे बड़ी बीमारी होगी। दवा लक्षण दबाती है, कारण नहीं मिटाती। गीता का स्थितप्रज्ञ सिद्धांत कहता है सुख-दुख में सम रहो। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कामना त्याग कर आत्मा में संतुष्ट रहता है और भय, क्रोध से मुक्त रहता है। योग और ध्यान कोर्टिसोल कम करते हैं। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोध भी इसकी पुष्टि करते हैं।
दूसरा पर्यावरण और जलवायु संकट। पश्चिम ने प्रकृति को संसाधन माना और दोहन किया। भारत ने प्रकृति को माता माना। पंचतत्व सिद्धांत कहता है कि शरीर और ब्रह्मांड पांच तत्वों से बने हैं। इसलिए निर्मल गंगा जैसी मुहिम में जल प्रदूषण को पाप माना गया है। पानी बचाना, प्लास्टिक बहिष्कार और वृक्षारोपण भारतीय जीवनशैली का हिस्सा है।
तीसरा तकनीक और नैतिकता का संघर्ष। AI, जेनेटिक इंजीनियरिंग और परमाणु शक्ति बिना नीति के विनाशकारी हो सकती है। महाभारत में अर्जुन के सामने भी यही प्रश्न था। गीता का उत्तर है निष्काम कर्म। तकनीक का उपयोग स्वार्थ के लिए नहीं, लोक कल्याण के लिए हो।
चौथा वैश्विक भारत की भूमिका। आज दुनिया भारत को विश्वगुरु के रूप में देख रही है। इसका कारण सॉफ्ट पावर है। योग दिवस, आयुर्वेद और बुद्ध का शांति संदेश। सांस्कृतिक शक्ति के बिना कोई राष्ट्र महाशक्ति नहीं बन सकता।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2023:
75 वर्षों बाद भारत को अपनी शिक्षा नीति मिली। NEP 2020 की सबसे बड़ी विशेषता IKS अर्थात Indian Knowledge System को मुख्यधारा में लाना है।
NEP 2020 कहती है कि कक्षा 5 तक मातृभाषा में पढ़ाई हो। यह गुरुकुल परंपरा की वापसी है। बहुविषयक शिक्षा हो। विज्ञान के साथ कला भी पढ़ो। कौशल आधारित शिक्षा हो। कक्षा 6 से ही बागवानी, बढ़ईगीरी और कला सीखो।
NCF 2023 इसे और आगे ले जाता है। इसमें वेद गणित, लोक कथा, भारतीय त्योहार और महापुरुषों की जीवन गाथा को पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया है। उद्देश्य है कि बच्चा बड़ा होकर इंजीनियर बने पर अपनी संस्कृति पर गर्व भी करे। यह पुनर्जागरण का सरकारी प्रयास है। उद्देश्य पश्चिम का अंधा अनुकरण नहीं, उद्देश्य है Modern with Roots।
- चुनौतियां और आगे का मार्ग:
मार्ग आसान नहीं है। तीन बड़ी चुनौतियां हैं।
पहली शोध। आयुर्वेद के सूत्रों को आधुनिक लैब में सिद्ध करना होगा। वेद गणित के सूत्रों को कंप्यूटर एल्गोरिदम में बदलना होगा। IIT और IISc में भारतीय ज्ञान व्यवस्था के विभाग इसी दिशा में काम कर रहे हैं।
दूसरी पाठ्यक्रम में अनिवार्य समावेश और शिक्षक प्रशिक्षण। जब तक शिक्षक स्वयं भारतीय ज्ञान परंपरा नहीं समझेगा, वह बच्चों को नहीं पढ़ा पाएगा। इसलिए DIET और विश्वविद्यालयों में IKS का प्रशिक्षण अनिवार्य होना चाहिए।
तीसरी युवाओं में आत्मगौरव और जिज्ञासा पैदा करना। सोशल मीडिया के युग में युवा भ्रमित हैं। उन्हें बताना होगा कि शून्य भारत की देन है, योग भारत की देन है, लोकतंत्र की पहली प्रयोगशाला भारत थी। गर्व होगा तो जिज्ञासा होगी।
- निष्कर्ष:
अंत में यही कहा जा सकता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा अतीत का गौरव नहीं है, यह भविष्य का रोडमैप है।
हम रॉकेट भी बनाएंगे और श्लोक भी याद रखेंगे। हम AI भी विकसित करेंगे और ध्यान भी करेंगे। हम आर्थिक महाशक्ति भी बनेंगे और आध्यात्मिक गुरु भी रहेंगे।
क्योंकि जिस राष्ट्र ने विश्व को शून्य दिया वह राष्ट्र शून्य नहीं हो सकता। जिस सभ्यता ने विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम का मंत्र दिया वह सभ्यता कभी संकीर्ण नहीं हो सकती।
भारतीय ज्ञान परंपरा हमें यही सिखाती है। तकनीक के साथ संवेदना, प्रगति के साथ संस्कार और विकास के साथ संतुलन।
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