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सूर खेड़ी सुठेली: शूरवीरों की भूमि का सुनहरा इतिहास, बावड़ी और वीरगाथाओं की कहानी

आगर-मालवा के सुठेली गांव का इतिहास, ‘सूरे की खेड़ी’ नाम, पोलिया महाराज का ओटला, भैरू महाराज की बावड़ी और लोक-स्मृतियों में सुरक्षित वीरगाथाओं की खोज।

सूर खेड़ी सुठेली : शूरवीरों की भूमि का सुनहरा इतिहास

इतिहास की मिट्टी में आज भी गूंजता है शौर्य, संस्कार और जल-संरक्षण का संदेश

कुछ गांव नक्शे पर केवल एक नाम होते हैं, लेकिन कुछ गांव अपनी मिट्टी में इतिहास की सांसें संजोए होते हैं। उनकी गलियों में बीते समय के पदचिह्न होते हैं, पुराने पेड़ों की छांव में पीढ़ियों की स्मृतियां होती हैं, किसी ओटले पर किसी गुमनाम वीर की शौर्यगाथा मौन खड़ी होती है और किसी पुरानी बावड़ी की सीढ़ियां उन हाथों की कहानी कहती हैं, जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए जल और जीवन का प्रबंध किया था।

सुठेली भी ऐसा ही गांव है। आज जिसे हम सुठेली के नाम से जानते हैं, उसके अतीत में ‘सूरे की खेड़ी’ नाम की एक ऐसी पहचान छिपी है, जो केवल किसी बस्ती का नाम नहीं, बल्कि शौर्य, स्वाभिमान, शरणागत की रक्षा, जल-संरक्षण और लोक-आस्था की एक लंबी परंपरा की ओर संकेत करती है।

इतिहास हमेशा राजमहलों, किलों और बड़े युद्धों में ही नहीं लिखा जाता। कई बार वह गांव के किसी पुराने ओटले, किसी बावड़ी की पत्थर की सीढ़ी, किसी सदियों पुराने बरगद-पीपल की छांव, किसी पाषाण प्रतिमा और बुजुर्गों की स्मृतियों में सुरक्षित रहता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम उन मौन साक्ष्यों को पढ़ने की दृष्टि विकसित करें।

पोलिया महाराज का ओटला, भैरू महाराज की बावड़ी, बजरंगबली और चामुंडा की पाषाण प्रतिमाएं, पुराने कुएं और वृक्ष—ये सब मिलकर सुठेली के उस अतीत की ओर संकेत करते हैं, जिसे अभी इतिहास के दस्तावेजों में पूरी तरह तलाशा जाना बाकी है। लोक-स्मृति और उपलब्ध भौतिक साक्ष्यों को यदि शोध की दृष्टि से देखा जाए, तो सुठेली केवल एक गांव नहीं रह जाती; वह मालवा की उस जीवंत परंपरा का हिस्सा दिखाई देती है, जहां वीरता केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं थी, बल्कि शरणागत की रक्षा, समाज की सुरक्षा और जल-संरक्षण जैसे कार्यों में भी दिखाई देती थी।

प्रस्तुत आलेख इसी लोक-स्मृति, आंखों देखे प्रमाणों और शोध-बोध की दृष्टि से सुठेली के अतीत को समझने का एक प्रयास है। यह अंतिम इतिहास होने का दावा नहीं, बल्कि उस इतिहास की खोज का निमंत्रण है, जो शायद गांव की मिट्टी में अब भी दबा हुआ है और शाजापुर, आगर-मालवा तथा उज्जैन के पुराने अभिलेखों में अपने प्रमाण की प्रतीक्षा कर रहा है।

आइए, पढ़ते हैं सुठेली की उसी स्मृति-यात्रा को—‘सूरे की खेड़ी’ से आज की सुठेली तक… शूरवीरों की उस भूमि का सुनहरा इतिहास।


🧑‍🧒 आंखों देखी शोधकर्ता

भीमपुरा पटेल लालाजी के पौत्र, रूग्गाजी के तृतीय पुत्र, सुहाग बाई के जाये, सेवाराम के छोटे भाई एवं अमेरिका में वैज्ञानिक डॉक्टर शैफाली के पिता।

सेवा निवृत्त प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय संगठन।
सदस्य – मध्यप्रदेश पाठ्य पुस्तक लेखन एवं देखरेख स्थाई समिति, मध्यप्रदेश शासन, भोपाल।

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आगर-मालवा जिले में तनोड़िया के समीप बसा सुठेली गांव, जिसका पुराना राजस्व नाम “सूरे की खेड़ी” है, मालवा की उस त्यागमयी परम्परा का जीवंत प्रमाण है जिसे इतिहास की किताबों में नहीं, हमारी भेरु बावड़ी, पोलिया महाराज का ओटला और बजरंगबली – चामुंडा पाषाण मूर्ति तथा गांव में बरगद, इमली और पीपल पेड़ में लिखा गया है।

1. नाम में ही इतिहास – सूरे की खेड़ी

मालवी और राजस्थानी में ‘सूरा’ का अर्थ होता है शूरवीर, और ‘खेड़ी’ का अर्थ है छोटी बस्ती। अर्थात सूरे की खेड़ी – शूरवीरों की बस्ती, आज की सुठेली। यह नाम ही बताता है कि यह गांव साधारण किसानों का नहीं, उन योद्धाओं का गांव रहा है जिन्होंने झुकने के बजाय लड़ना चुना था। यह गांव कम से कम 500 से 700 वर्ष पुराना है।

2. शरणागत वत्सलता का प्रतीक – पोलिया महाराज का ओटला

गांव में स्थित पोलिया महाराज का ओटला है। मालवा-राजस्थान में ओटला या थान केवल किसी देवता का नहीं, उस वीर की स्मृति में बनाया जाता है जिसने धर्म, समाज या शरण में आए किसी व्यक्ति की रक्षा के लिए अपने प्राण दिए हों।

पोलिया महाराज की स्थापना की लोक-कथा के अनुसार किसी जमाने में सुठेली के किसी एक अथवा एक से अधिक योद्धाओं ने मदद मांगने शरण में आए व्यक्ति या व्यक्तियों की रक्षा की थी। भारतीय संस्कृति में शरणागत की रक्षा को सबसे बड़ा धर्म माना गया है – “शरणागत वत्सलता”।

बाद की घटना इसका प्रमाण प्रस्तुत करती है। ब्रिटिश काल में जब आगर-मालवा सिंधिया रियासत का हिस्सा था और अंग्रेजों की बेगार प्रथा चरम पर थी, तो सुठेली के इसी वंश के योद्धा ने अंग्रेज सिपाही की बेगारी करने से मना कर दिया। कहासुनी के बाद पारसी-गुनाखेड़ी के रास्ते में पीछे से भाले से वार कर अंग्रेज पुलिस ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया था।

उस गुमनाम स्थान पर आज पोल्या महाराज का छोट से ओटले के रूप में पूजा जाता है। सुठेली निवासी किसन लाल मालवीय (कुकड़ीगनावदिया) के पिताश्री स्वर्गीय नगजी राम जी ने 70 साल तक लगातार घायला की चौदस पर वहां जाकर पूजा करते थे। यह परम्परा दर्शाती है कि ऐसे वीर कालांतर में लोक-देवता बन जाते हैं, जिनसे गांव आज भी अपनी सुरक्षा की मन्नत मांगता है।

3. जल-प्रबंधन और स्थापत्य का प्रमाण – भैरू महाराज की बावड़ी

सुठेली के दक्षिणी छोर पर, खेड़ा गांव के रास्ते पर स्थित बावड़ी जिसे भैरू महाराज की बावड़ी कहा जाता है, इस गांव की समृद्धि का सबसे बड़ा प्रमाण है।

  • यह बावड़ी 500 से 700 साल पुरानी है।
  • इसके किनारे 200 से 300 साल पुराने पीपल के पेड़ थे।
  • बड़े-बड़े पत्थरों को कड़ियों से जोड़कर बनाया गया है, जिसे आज भी हिलाना नामुमकिन है। इतने विशाल पत्थरों का उपयोग सीढ़ियों, सुरक्षा दीवार और रहट में किया गया था।
  • उस जमाने में विशाल निर्माण किसी गरीब बस्ती में नहीं हो सकता। यह किसी बड़े समृद्ध स्थानीय जमींदार ‘सूरे’ के संरक्षण में ही संभव था।

“जहां आज के सुरे तुम हो”।

यह बावड़ी, इसके साथ लगे बरगद, पीपल, इमली के पेड़, (अब नहीं रहे, लेकिन 80-90 साल पहले के हमारे गांव के वरिष्ठ नागरिक नंदराम साहेब और घीसालाल मालवीय के पुत्र मुन्ना लाल और मेरी उम्र के लोगों ने देखे हैं और उनकी छांव में बैठे -खेले भी हैं।

गांव के आसपास पांच झाझले (खण्हर) कुए थे जिनके किनारे बहुत ही पुराने इमलियों और आम के पेड़ हमने देखे हैं। यह मालवा के प्राचीन जल-प्रबंधन के वैज्ञानिक प्रमाण हैं।

4. आस्था और संस्कृति के साक्ष्य

यदि हम तीनों सूत्रों को जोड़ दे और शोध -बोध दृष्टि से देखते हैं तो ज्ञात होता है कि – सूरे की खेड़ी नाम, पोलिया महाराज और बजरंगबली का ओटले, और भैरू महाराज की बावड़ी, तो एक पूरा ताना-बाना बनता है कि आज की सुठेली एक ऐतिहासिक धरोहर और परंपरा की साक्षी रहीं हैं।

गांव में मैरे घर के पीछे विद्यमान 3 से 5 फीट ऊंची हनुमान और चामुंडा देवी की पाषाण मूर्ति, शिव जलाधारी, 150 साल से भी अधिक समय पहले ईंट-पत्थर से बनाया गया चबूतरा और उसके सामने झाझला कुआं (अब नहीं है)- ये सब मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि सुठेली- शूरवीरों का इतिहास, शरणागत रक्षा का बलिदान, धार्मिक आस्था और मजबूत वास्तुकला की धरोहर है।

तनोड़िया और आगर क्षेत्र का इतिहास भी इसकी पुष्टि करता है। यह क्षेत्र ग्वालियर के सिंधिया वंश का महत्वपूर्ण प्रशासनिक हिस्सा रहा। ठीकाना तनोडिया के राव सज्जन सिंह जी का रावला प्रशासनिक इकाई इसका जिगता जागता प्रमाण है। मराठा काल, पिंडारी युद्धों और 1857 की क्रांति में आगर के ग्रामीणों ने छापामार युद्ध लड़ा था। सुठेली गांव कभी गुंदी के रावजी के अधिन भी रहा है। इसका प्रमाण यह है कि आजादी के बाद हमारा गांव गुंदी पंचायत में रहा है। दुसरा सुठेली से गुंदी तक पहले चरनोई अर्थात गायें चराने की जगह थी।

सुठेली के गुमनाम योद्धा मालवीय जो बेगारी, (बेगार प्रथा बिना वेतन के जबरन काम कराने की एक पुरानी और शोषणकारी व्यवस्था थी। इस प्रथा के तहत गरीब किसानों, मजदूरों और समाज के पिछड़े वर्गों को राजाओं, जमींदारों या ब्रिटिश अधिकारियों के लिए मुफ्त में काम करने के लिए मजबूर किया जाता था) का काम करता था, की अंग्रेजों से लड़ाई उसी कड़ी का हिस्सा थी। यदि यह सत्य है तो सुन्ठेली या सुठेली स्वतंत्रता सेनानी का गांव है।


निष्कर्ष : अपनी विरासत की लाज रखें

निष्कर्ष रूप में सुठेली वासी जो रिश्ते में मैरे भाई- बहन, मामा- मामी और बचपन के दोस्त – यार और नयी पीढ़ी से निवेदन है कि 👉🏻

सुठेली केवल एक गांव नहीं, एक ऐतिहासिक धरोहर है, इसे संभालें और इसकी लाज रखें। लाज रखनें से मेरा तात्पर्य यह है कि संस्कारों की धरोहर को जीवित रखना, व्यसनों से मुक्त रहकर चरित्रवान बनना और अपनी आने वाली पीढ़ी को मर्यादा का पाठ पढ़ाना।

क्योंकि ☝️👇🏻

1. पोलिया महाराज का ओटला हमें सिखाता है कि शरण में आए की रक्षा के लिए प्राण देना हमारा धर्म है।

2. सूरे की खेड़ी नाम हमें याद दिलाता है कि हम शूरवीरों की संतान हैं।

3. भैरू बावड़ी हमें सिखाती है कि हमारे पूर्वज जल का सम्मान करना जानते थे।

आओ, हम सब मिलकर हमारे पूर्वजों से मिली इन धरोहरों के बारे में अधिक जानकारी के लिए शाजापुर, आगर मालवा तथा उज्जैन के लेखागार में जाकर प्राचीन रिकार्ड का अध्ययन करें। अभी जितनी भी धरोहर है उसे सहेजें। बावड़ी की सफाई करें, ओटले पर सप्ताह में एक दिन बुजुर्गों के साथ बैठकर अपने बच्चों को बताएं कि तुम किसी साधारण गांव के नहीं, सूरे की खेड़ी के वासी सुरवीर हो।

जय पोलिया महाराज!
जय भैरू महाराज!!
जय सूरे की खेड़ी!!!
मैरी और हम सबकी जन्म स्थली सुठेली!!!


✍️ लेखक परिचय

डॉ. बालाराम परमार ‘हंसमुख’

27 सितंबर 2026, रविवार
तिथि: आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा
विक्रम संवत: 2083 आश्विन भाद्रपद
शक संवत: 1948 (आश्विन)

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