जनमत जागरण @आपके लेख :: कबीर साहब का सिक्का:सात समंदर पार भी दिखा ✍️ डॉ बालाराम परमार 'हॅंसमुख' हालाँकि मुझे अमेरिका आए कुछ ही समय हुआ है। फिर भी कबीर साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में लोगों की राय जानने का प्रयास अप्रत्यक्ष रूप से पद्म श्री टिपानिया जी जब से संयुक्त राज्य अमेरिका में अपने भजन का कार्यक्रम देने आते रहे हैं, तब से विशेष जानकारी लेने का प्रयास करता रहा हूं। मेरे लिए यह गर्व का विषय है कि केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षक होने के कारण मेरे पढाए विद्यार्थी विश्व के लगभग 40 देशों में कार्यरत है। अमेरिका में लगभग 20 विद्यार्थी पहले से ही संपर्क में रहें हैं। आध्यात्मिक जानकारी लेने का मैं हमेशा जिज्ञासु रहा हूं। ऐसी जिज्ञासा के कारण द्वितीय स्तर की जानकारी के अनुसार कबीर साहब की वाणी और शिक्षा को संयुक्त राज्य अमेरिका सहित दुनिया भर के विद्वानों और आध्यात्मिक साधकों द्वारा व्यापक रूप से सराहा गया है। 15वीं शताब्दी में भक्ति, आध्यात्मिक और सामाजिक सुधार पर कबीर साहब का दृष्टिकोण विश्व के अन्य समाज सुधारक की विविध पृष्ठभूमि और संस्कृतियों के लोगों के साथ मेल खाता है। क्योंकि धार्मिक -सामाजिक बुराइयां सभी महाद्वीपों पर निवास करने वाले समाज में लगभग एक जैसी ही होती है। विशेष कर आर्थिक : अमीरी-गरीबी, सामाजिक : जातिगत भेदभाव, सांस्कृतिक: रंगभेद। कबीर साहब के दर्शन के कुछ ऐसे प्रमुख पहलू हैं जो अमेरिकियों के आध्यात्मिक जीवन दर्शन से मिलते-जुलते हैं। इनमें से प्रथम स्थान भक्ति और आध्यात्मिकता का आता है। व्यक्तिगत भक्ति और आध्यात्मिक विकास पर कबीर का ध्यान कई अमेरिकियों को अपनी ओर आकर्षित किया है, जो विभिन्न आध्यात्मिक परंपराओं की खोज करता दिखाई देता है। इस अवधूत अक्खड़ कवि ने कालजयी दोहे भक्ति भाव को लेकर शब्दों में पीरोए है। 4 जुलाई , 1776 अर्थात 350 साल पहले स्वतंत्र हुए अमेरिकियों को आध्यात्मिक गुरु के रूप किसी न किसी रूप में लुभाते रहे हैं।"भक्ति बीज पलटै नहीं, जो जुग जाय अनन्त ।ऊँच नीच घर अवतरै, होय सन्त का सन्त ।।""भक्ति पदारथ तब मिलै, तब गुरु होय सहाय। प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय।।"भक्ति जो सीढ़ी मुक्ति की, चढ़ै भक्त हरषाय ।और न कोई चढ़ि सकै, निज मन समझो आय।।"भक्ति बिन नहिं निस्तरे, लाख करे जो कोय ।शब्द सनेही होय रहे, घर को पहुँचे सोय ।।"उपरोक्त दोहों मैं छुपे भाव के अनुरूप अमेरिका के लोगों में ईश्वर के प्रति भक्ति देखने को मिलती है। अमेरिका ईसाईयत तरीके से भक्ति भाव प्रधान है, लेकिन अधिकतर लोग धर्म के प्रति अंधभक्त नहीं है। कर्म में और भाईचारा में विश्वास करते हैं। 👉👉 आज विज्ञान कितने भी उन्नति कर ले लेकिन विश्व के सभी समाज में सामाजिक सुधार की गुंजाइश बनी रहती है। सामाजिक-आर्थिक बुराइयों से अमेरिका महाद्वीप अछूता नहीं है। अमेरिका जब 350 साल पहले इंग्लैंड के अधीन था तब भी सामाजिक-आर्थिक विषमता थी और आज भी नस्लवाद के रूप में बनी हुई है। भारतीय समाज में सामाजिक असमानता, धार्मिक पाखंड और उत्पीड़न के बारे में कबीर की आलोचनाएं सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के बारे में चिंतित अमेरिकियों को पसंद आती है। संयुक्त राज्य अमेरिका में अफ्रीकी-अमेरिकी के नस्लीय भेदभाव और अलगाव का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसका उपयोग बहुसंख्यक श्वेत आबादी द्वारा नियंत्रण और शक्ति प्रक्षेपण के साधन के रूप में किया जाता रहा है। इस अलगाव को समाप्त करने का आंदोलन सफल रहा लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका नस्लीय असमानताओं और अफ्रीकी अमेरिकियों और अन्य रंग के लोगों के लिए अवसरों की कमी वाला एक नस्लीय रूप से संरचित समाज बना हुआ है। एक बड़ा अंतर - शिक्षा, आय, धन, स्वास्थ्य और न्याय में – विशेष रूप से श्वेत और अश्वेत अमेरिकियों के बीच बना हुआ है, जिनकी गुलामी का इतिहास, कानूनी अलगाव और राज्य द्वारा अनुमोदित आतंकवाद आंशिक रूप से समाज में कलंकित स्थिति के लिए जिम्मेदार है।भारत और अन्य एशियाई देशों में व्याप्त और मिलता जुलता सामाजिक अन्याय अमेरिका और अन्य विकसित देश में भी है। जिसके लिए कबीर की यह वाणी तर्कपूर्ण सीख दिखाई देती है।'जे तू बाँभन बभनी जाया, तो आँन द्वार ह्वै काहे न आया। ....अरे इन दोउन राह न पाइ।हिन्दू अपनी करै बड़ाई, गागर छुवन न देई। वेश्या के पायन तर सोवैं, यह देखी हिन्दुवाई।मुसलमान के पीर औलिया, मुरगा-मुरगी खाई।खाला केरी बेटी ब्याहैं घरहि में करैं सगाई।हिन्दुन की हिन्दुवाई देखी तुरकन की तुरकाई।कहै कबीर सुनौ भाई साधौ, कौन राह है जाई। 👉👉 समावेशिता और विविधता: कबीर वाणी और शिक्षाएं सभी धर्मों और संस्कृतियों में एकता की झलकियां देखतीं हैं, जो अमेरिकी समाज में व्यापक रूप से साझा किया जाने वाला मूल्य है - सादा जीवन। सादा जीवन, भौतिक संपत्ति से वैराग्य और आंतरिक चिंतन पर कबीर का जोर अति सूक्ष्मवाद और सचेतनता में रुचि रखने वाले अमेरिकियों को पसंद आता है। 'बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥जाति-पाँति पूछे नहि, कोई हरि को भजै। चारो खान पांचो मेवा, सबहिं को एक रसा दे॥इस प्रकार हम देखते हैं कि कबीर ने केवल भारतीय समाज को ही नहीं जगजोड़ा बल्कि विश्व के सभी समाज को संदेश देने का भरपूर प्रयास किया है। अमेरिका से साहेब बंदगी।