सुसनेर नगर परिषद उपचुनाव: भाजपा की लहर में कांग्रेस की सेंधमारी

नगर परिषद उपचुनाव : भाजपा लहर में मस्त, कांग्रेस की खामोश सेंधमारी
मौन है मतदाता, दबे-छुपे बयां कर रहा पुराने कार्यकाल और अधूरे वादों का दर्द; आखिरी दो दिन में बदल सकता है चुनावी समीकरण
सुसनेर। नगर परिषद सुसनेर उपचुनाव का रण अब बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। मतदान की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, चुनावी माहौल भी करवट बदलता दिखाई दे रहा है। ऊपर से नगर में भाजपा की जबरदस्त लहर नजर आ रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर कांग्रेस भी बिना ज्यादा शोर किए मतदाताओं के बीच अपनी जगह बनाने में जुटी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि दिखाई दे रही लहर भारी पड़ेगी या फिर मतदाता के मन में छिपी नाराजगी मतदान के दिन कोई अलग तस्वीर सामने लाएगी।
सबसे बड़ा फैक्टर—मौन मतदाता
गली-मोहल्लों में हर प्रत्याशी को एक ही जवाब मिल रहा है—“आप ही को देंगे।” लेकिन भीतरखाने मतदाता पुराने कार्यकाल का हिसाब खोल रहा है। नालियों की सफाई, बंद स्ट्रीट लाइट, पेयजल, अधूरी गलियां, पार्षदों से नाराजगी और इस कार्यकाल में चली खींचतान व भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर आमजन के बीच चर्चाएं हैं।
“वादे बड़े, काम आधे-अधूरे”—यही दर्द इस बार वोट की चोट बन सकता है। कांग्रेस इसी नाराजगी को मुद्दा बनाकर घर-घर संपर्क कर रही है, जबकि भाजपा अपने संगठन, जनाधार और चुनावी माहौल के भरोसे मजबूती से मैदान में डटी हुई है।
यही वजह है कि इस चुनाव में मौन मतदाता सबसे बड़ा फैक्टर बनकर उभर रहा है। सार्वजनिक रूप से समर्थन का भरोसा देने वाला मतदाता मतदान के समय किसके पक्ष में खड़ा होता है, यही चुनाव की असली तस्वीर तय करेगा।
भोपाल विधायक आरिफ मसूद की सक्रियता से मुस्लिम मतों के समीकरण पर नजर
कांग्रेस ने मुस्लिम मतदाताओं के बीच संपर्क मजबूत करने के लिए भोपाल विधायक आरिफ मसूद को मैदान में उतारा है। शुक्रवार को मसूद की सक्रियता के बाद कांग्रेस खेमे में उत्साह दिखाई दिया। कांग्रेस समर्थकों का दावा है कि मुस्लिम मतदाताओं में पार्टी के पक्ष में एकजुटता बढ़ रही है और इसका चुनावी असर देखने को मिल सकता है।
हालांकि इस समीकरण का वास्तविक असर कितना होगा, यह मतदान के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल मुस्लिम मतदाताओं के रुख को लेकर दोनों राजनीतिक खेमों की निगाहें टिकी हुई हैं।
अब राणा के भरोसे भाजपा का रण
भाजपा की चुनावी रणनीति में पूर्व विधायक राणा विक्रम सिंह की भूमिका महत्वपूर्ण दिखाई दे रही है। भाजपा के लिए राणा का लंबा चुनावी अनुभव, संगठनात्मक पकड़ और विभिन्न समाज-वर्गों में व्यक्तिगत संपर्क चुनावी अभियान का प्रमुख आधार बना हुआ है।
राणा विक्रम सिंह लगातार घर-घर संपर्क कर भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हैं। भाजपा खेमे को उम्मीद है कि उनका व्यक्तिगत जनसंपर्क और स्थानीय पकड़ चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में बनाए रखेगी।
आरिफ बनाम राणा—प्रतिष्ठा से ज्यादा अब रणनीति की परीक्षा
जैसे-जैसे चुनाव अंतिम दौर में पहुंच रहा है, राजनीतिक चर्चा में आरिफ मसूद और राणा विक्रम सिंह की सक्रियता की तुलना भी सामने आने लगी है। एक ओर कांग्रेस मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के प्रयास में है, तो दूसरी ओर भाजपा राणा के जनसंपर्क और संगठनात्मक ताकत के सहारे मैदान मजबूत कर रही है।
भाजपा खेमा सामान्य हिंदू मतदाताओं और विकास के मुद्दे को लेकर आश्वस्त दिखाई दे रहा है। वहीं कांग्रेस पुराने कार्यकाल की नाराजगी और स्थानीय समस्याओं को चुनावी मुद्दा बनाने में जुटी है।
ऐसे में ऊपर से समर्थन का भरोसा देने वाला मौन मतदाता, भीतर से पुराने कार्यकाल का दर्द और अंतिम दौर में सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश—इन तीनों ने इस उपचुनाव को बेहद रोचक बना दिया है।
अब देखना यह है कि भाजपा की दिखाई दे रही लहर भारी पड़ती है या कांग्रेस की खामोश सेंधमारी कोई नया समीकरण सामने लाती है।
कांग्रेस का आरोप : ‘महाराज’ और ‘नाराज’ में उलझी भाजपा
शुक्रवार को तराना विधायक महेश परमार, राघोगढ़ विधायक जयवर्धन सिंह, महिदपुर विधायक दिनेश जैन ‘बॉस’ और सुसनेर विधायक भैरूसिंह परिहार ‘बापू’ सहित कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने नुक्कड़ सभाएं कीं।
कांग्रेस ने भाजपा के भीतर ‘महाराज’ और ‘नाराज’ दो गुट होने का दावा करते हुए दतिया की तर्ज पर “वक्त है बदलाव का” स्लोगन के साथ भाजपा को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरा। कांग्रेस नेताओं ने भाजपा प्रत्याशी को भी निशाने पर लिया।
अब सबकी नजर शनिवार को होने वाले नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के रोड शो पर है। भाजपा के लिए यह रोड शो अंतिम दौर में कार्यकर्ताओं और समर्थकों को एकजुट करने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कांग्रेस प्रत्याशी का ‘इमोशनल टच’
कांग्रेस प्रत्याशी विष्णु पाटीदार का “भ्रष्टाचार नहीं करने की शपथ” लेना और अधूरे कामों को निजी खर्च से पूरा कराने का वादा आमजन के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
कांग्रेस इसे जहां विश्वास और जवाबदेही के संदेश के रूप में पेश कर रही है, वहीं भाजपा बाहरी पदाधिकारियों और बड़े नेताओं के साथ अपने स्थानीय संगठन एवं जनाधार के भरोसे चुनावी मैदान में मजबूती बनाए हुए है।
क्या पर्सनल संपर्क या पिछला परफॉर्मेंस देगा जीत?
राजनीतिक जानकारों की नजर में इस बार चुनाव केवल बड़े नेताओं की सभाओं और नारों से तय नहीं होगा। व्यक्तिगत संपर्क, वार्ड स्तर की पकड़ और पिछले कार्यकाल का प्रदर्शन भी मतदाता के निर्णय को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण मुद्दे हो सकते हैं।
जो प्रत्याशी मतदाता के इस मौन दर्द को बेहतर तरीके से समझकर उसके बीच पहुंच बना पाएगा, उसके लिए चुनावी समीकरण मजबूत हो सकते हैं। फिलहाल सुसनेर में मुकाबला एकतरफा नजर नहीं आ रहा, बल्कि अंतिम दौर में दोनों पक्ष अपनी-अपनी ताकत झोंकते दिखाई दे रहे हैं।
पुराने कार्यकाल के अधूरे कामों को लेकर उठ रही नाराजगी को “विकास के नए वादों” से साधने की रणनीति चल रही है। दूसरी ओर भाजपा अपने संगठन, राजनीतिक माहौल और व्यक्तिगत जनसंपर्क के सहारे मतदाताओं को अपने पक्ष में बनाए रखने की कोशिश में है।
अब अंतिम दो दिन में कौन-सा मुद्दा मतदाता के मन पर असर डालता है, कौन-सा प्रत्याशी घर-घर तक अपनी बात पहुंचा पाता है और सबसे महत्वपूर्ण—मौन मतदाता मतदान केंद्र पर किसके पक्ष में अपना मौन तोड़ता है, इसका जवाब चुनाव परिणाम के साथ ही सामने आएगा।
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