सुसनेर नगर परिषद उपचुनाव: 75.96% मतदान, भाजपा की जीत का दावा और कांग्रेस की चुनौती- पढ़ें सार्थक विश्लेषण
सुसनेर नगर परिषद अध्यक्ष पद उपचुनाव में वार्डवार मतदान प्रतिशत, भाजपा-कांग्रेस मुकाबले और पांच साल की स्थानीय राजनीतिक उठापटक का विश्लेषण।

75.96% मतदान ने बढ़ाई धड़कनें, भाजपा का ‘तीन अंकों’ का दावा कितना टिकेगा?
महिलाओं के 1,913 वोट घर में रह गए, वार्ड 12 की कम वोटिंग ने बढ़ाए सवाल; पांच साल की नगर परिषद की उठापटक, अंदरूनी असंतोष और बूथवार आंकड़े बनाएंगे 3 अक्टूबर का असली गणित
जनमत जागरण @ सुसनेर ✍️ ग्राउंड इनपुट संवाददाता — दीपक जैन ।
नगर परिषद अध्यक्ष पद का उपचुनाव मतदान के साथ भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन सुसनेर की राजनीतिक गणित अभी खत्म नहीं हुई है। 3 अक्टूबर को EVM खुलने तक भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने-अपने आंकड़ों को अपने पक्ष में पढ़ रहे हैं। भाजपा खेमे में जीत को लेकर आत्मविश्वास दिखाई दे रहा है और स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में जीत का अंतर तीन अंकों में रहने का अनुमान भी लगाया जा रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस का दावा है कि उसने यह चुनाव केवल प्रत्याशी का नहीं, बल्कि सत्ता और स्थानीय व्यवस्था के खिलाफ मुकाबले के रूप में लड़ा है। ऐसे में अब सवाल किसी एक दल के दावे का नहीं, बल्कि यह है कि 75.96 प्रतिशत मतदान में सुसनेर के मतदाता ने पिछले पांच वर्षों की नगर राजनीति को किस तरह दर्ज किया है।
29 सितंबर को हुए मतदान में नगर परिषद क्षेत्र के 13,843 मतदाताओं में से 10,515 ने मतदान किया, यानी कुल मतदान 75.96 प्रतिशत रहा। भाजपा के प्रदीप सोनी और कांग्रेस के विष्णु पाटीदार के बीच सीधा मुकाबला हुआ है और मतगणना 3 अक्टूबर को होगी।
महिलाओं के 1,913 वोट नहीं पड़े—यह आंकड़ा क्यों महत्वपूर्ण है?
वार्डवार तालिका का सबसे दिलचस्प पहलू महिला मतदान से जुड़ा है। नगर में कुल 6,928 महिला मतदाता थीं, लेकिन मतदान करने वाली महिलाओं की संख्या 5,015 रही। यानी 1,913 महिला मतदाताओं ने मतदान नहीं किया।
इसे किसी दल के पक्ष या विपक्ष में सीधा संकेत मानना उचित नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक दलों के लिए यह निश्चित रूप से बड़ा अप्रयुक्त मतदाता आधार है। खासकर तब, जब कुल मतदान 75.96 प्रतिशत रहा हो। भाजपा के लिए यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो सकता है कि उसके स्थानीय कार्यकर्ताओं और समर्थकों में यदि महिला मतदाताओं को लेकर अपेक्षित लामबंदी नहीं हुई, तो उसके दावे और वास्तविक EVM आंकड़ों के बीच अंतर हो सकता है। वहीं कांग्रेस के लिए भी यही स्थिति है—कम महिला मतदान का लाभ उसे स्वतः नहीं मिल जाता।
अर्थात 1,913 महिलाओं का मतदान से बाहर रहना परिणाम को प्रभावित करने की संभावना वाला आंकड़ा है, लेकिन किस दिशा में प्रभाव पड़ा, यह मतगणना ही बताएगी।
वार्ड 1 का 86.05 प्रतिशत और वार्ड 12 का 63.68 प्रतिशत—22.37 अंक का अंतर
वार्डवार आंकड़े चुनाव की कहानी को और जटिल बनाते हैं। वार्ड 1 में सर्वाधिक 86.05 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि तालिका के अनुसार वार्ड 12 में सबसे कम 63.68 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ। दोनों के बीच 22.37 प्रतिशत अंक का अंतर है।
इसके अलावा वार्ड 14 में 82.40 प्रतिशत, वार्ड 4 में 81.38 प्रतिशत, वार्ड 9 में 81.37 प्रतिशत और वार्ड 2 में 80.48 प्रतिशत मतदान हुआ। दूसरी ओर वार्ड 5 में 72.22, वार्ड 10 में लगभग 73.85, वार्ड 11 में 74.31 और वार्ड 13 में 73.34 प्रतिशत मतदान रहा।
इससे एक बात साफ दिखाई देती है कि सुसनेर में मतदाता सक्रियता पूरे नगर में एक जैसी नहीं रही।
वार्ड 12 भाजपा के लिए सवाल क्यों बन रहा है?
स्थानीय राजनीतिक समीकरणों में वार्ड 12 को भाजपा के मजबूत क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा है। दीपक जैन के फील्ड इनपुट के अनुसार विधानसभा और लोकसभा चुनावों में इस क्षेत्र से भाजपा को अच्छा समर्थन मिला था। ऐसे में यहां 63.68 प्रतिशत मतदान को भाजपा समर्थक खेमे के लिए चिंता के एक बिंदु के रूप में देखा जा रहा है।
लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। कम मतदान अपने आप में यह नहीं बताता कि शेष मत किस दल के पक्ष में गए। यदि कम मतदान दोनों दलों के समर्थक समूहों में समान रूप से रहा हो तो उसका प्रभाव अलग होगा, और यदि किसी एक पक्ष का समर्थक वर्ग अधिक संख्या में मतदान से बाहर रहा हो तो परिणाम पर उसका असर अलग हो सकता है।
यही कारण है कि वार्ड 12 का मतदान प्रतिशत राजनीतिक रूप से चर्चा का विषय जरूर है, लेकिन अभी इसे किसी प्रत्याशी के पक्ष में निर्णायक संकेत नहीं कहा जा सकता।
वार्ड 7 और 10 के आंकड़े भी महत्वपूर्ण
वार्ड 7 और वार्ड 10 में दो-दो मतदान केंद्रों के आंकड़े हैं। उपलब्ध बूथ आंकड़ों को जोड़ने पर वार्ड 7 में लगभग 74.89 प्रतिशत और वार्ड 10 में लगभग 73.85 प्रतिशत मतदान बैठता है।
वार्ड 7 मतदान के दौरान EVM को लेकर विवाद के कारण भी चर्चा में रहा। कांग्रेस विधायक भेरूसिंह परिहार ‘बापू’ की आपत्ति के बाद लगभग 15 मिनट मतदान प्रभावित रहने की रिपोर्ट सामने आई है।
यही नहीं, मतदान के दौरान फर्जी मतदान को लेकर भी आरोप-प्रत्यारोप हुए और कांग्रेस जिला अध्यक्ष तथा पुलिस अधिकारी के बीच बूथ पर बहस की स्थिति सामने आई। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है, इसलिए उन्हें संबंधित पक्षों के आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
भाजपा का आत्मविश्वास बनाम कांग्रेस की उम्मीद
भाजपा खेमे में मतदान के बाद जीत को लेकर आत्मविश्वास दिखाई दे रहा है। स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में भाजपा नेतृत्व द्वारा जीत का अंतर तीन अंकों में रहने का अनुमान लगाए जाने की बात कही जा रही है। लेकिन चुनावी गणित में आत्मविश्वास और EVM का परिणाम दो अलग चीजें हैं।
भाजपा के सामने एक ओर प्रदेश में उसकी सरकार और संगठनात्मक ढांचा है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय नगर परिषद के पिछले कार्यकाल की घटनाएं भी इसी चुनाव की पृष्ठभूमि का हिस्सा हैं। पिछले पांच वर्षों में अध्यक्ष पद को लेकर बदलाव, आरोप-प्रत्यारोप, भाजपा पार्षदों के बीच मतभेद और अविश्वास की स्थिति जैसी घटनाओं ने नगर परिषद की राजनीति को लगातार चर्चा में रखा। न्यायालयी हस्तक्षेप के बाद उपचुनाव की स्थिति बनी और वर्तमान मुकाबला सामने आया। सार्वजनिक रिपोर्टों में भी नगर परिषद की आंतरिक खींचतान और न्यायालय तक पहुंचे विवाद का उल्लेख हुआ है।
यानी भाजपा के लिए चुनौती सिर्फ कांग्रेस प्रत्याशी नहीं, बल्कि अपने ही कार्यकाल की स्थानीय राजनीतिक विरासत भी है।
पाटीदार के सामने पुरानी चुनावी छवि की चुनौती
कांग्रेस प्रत्याशी विष्णु पाटीदार को लेकर स्थानीय राजनीति में दो तरह की बातें सुनाई दे रही हैं। उनके समर्थक उन्हें लोकप्रिय और लंबे समय से सक्रिय राजनीतिक चेहरा मानते हैं, जबकि विरोधी उनकी पिछली चुनावी असफलताओं को मुद्दा बना रहे हैं।
स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में यह बात भी कही जा रही है कि अलग-अलग चुनावों में मैदान बदलने के बावजूद पाटीदार को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। वार्ड 7 से जुड़े उनके पुराने चुनावी प्रदर्शन को लेकर भी राजनीतिक चर्चा है। हालांकि इस तरह के पुराने चुनावी रिकॉर्ड को वर्तमान चुनाव का परिणाम मान लेना उचित नहीं होगा। इस बार अध्यक्ष पद का चुनाव पूरे नगर का है और इसका गणित किसी एक वार्ड के पुराने परिणाम से अलग है।
इसलिए पाटीदार के सामने वास्तविक चुनौती यही है कि पुराने चुनावी रिकॉर्ड की धारणा को वर्तमान नगरव्यापी मुकाबले में वे किस हद तक बदल पाए हैं।
उज्जैन का घटनाक्रम—राजनीतिक चर्चा में जरूर, लेकिन प्रभाव का प्रमाण नहीं
मतदान से ठीक पहले उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण के दौरान शाही मस्जिद के बाधक हिस्से को हटाने को लेकर विवाद हुआ था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार मामला सड़क चौड़ीकरण से जुड़े हिस्से को हटाने का था और इस पर तनाव तथा न्यायालयी कार्रवाई भी हुई।
स्थानीय राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि इस घटनाक्रम की चर्चा सुसनेर में भी हुई और इससे कुछ मतदाता प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन सुसनेर के मतदान परिणाम पर इस घटना के प्रभाव का कोई स्वतंत्र सर्वे या प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे चुनावी परिणाम का कारण बताने के बजाय स्थानीय राजनीतिक चर्चा के एक संभावित मुद्दे के रूप में ही देखना उचित होगा।
सार्थक विश्लेषण : चुनाव भाजपा बनाम कांग्रेस से आगे, पांच साल की नगर राजनीति का जनमत भी
सुसनेर का यह चुनाव अब केवल प्रदीप सोनी बनाम विष्णु पाटीदार नहीं रह गया है। यह पांच वर्षों से चली आ रही नगर परिषद की राजनीतिक उठापटक, अध्यक्ष पद के विवाद, पार्षदों के बीच मतभेद, न्यायालय तक पहुंचे घटनाक्रम और सत्ता पक्ष के स्थानीय प्रदर्शन की भी परीक्षा है। भाजपा के लिए सकारात्मक पक्ष यह है कि उसका संगठन और सत्ता का आधार मौजूद है तथा उसके खेमे में जीत को लेकर मजबूत आत्मविश्वास दिखाई दे रहा है; लेकिन उसी के साथ यह सवाल भी मौजूद है कि पिछले कार्यकाल की अंदरूनी खींचतान का कितना असर मतदाताओं पर पड़ा। कांग्रेस के सामने भाजपा के इसी स्थानीय रिकॉर्ड को मुद्दा बनाने का अवसर था और उसने इसे सरकार तथा स्थानीय व्यवस्था के खिलाफ मुकाबले के रूप में पेश किया। दूसरी ओर कांग्रेस को अपने प्रत्याशी की पुरानी चुनावी छवि और पूर्व के परिणामों से आगे निकलकर नया जनादेश हासिल करना है। 75.96 प्रतिशत मतदान, महिलाओं के 1,913 वोटों का मतदान से बाहर रहना, वार्ड 1 के 86.05 प्रतिशत से लेकर वार्ड 12 के 63.68 प्रतिशत तक का अंतर और वार्ड 7-10 जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मध्यम मतदान—ये सभी संकेत चुनाव को रोचक बनाते हैं, लेकिन इनमें से कोई भी अकेला संकेत जीत तय नहीं करता। इसलिए भाजपा का तीन अंकों का दावा हो या कांग्रेस की सरकार-विरोधी लड़ाई का दावा—दोनों फिलहाल राजनीतिक आकलन हैं। 3 अक्टूबर को जब EVM खुलेगी, तब यह स्पष्ट होगा कि सुसनेर के मतदाताओं ने सत्ता के साथ निरंतरता चुनी, पिछले स्थानीय घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया दी, या दोनों दलों के दावों से अलग अपना कोई तीसरा राजनीतिक संदेश दर्ज किया।
– राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
संपादक व संस्थापक जनमत जागरण, वरिष्ठ पत्रकार | समसामयिक विषयों के विश्लेषक
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