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महाराजा विक्रमादित्य “हेमकर्ण” और उनके पूर्वज – लेखक डॉ बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’ सेवा निवृत्त प्राचार्य केंद्रीय विद्यालय संगठन

जनमत जागरण @ आपके लेख::  महाराजा विक्रमादित्य "हेमकर्ण" और उनके पूर्वज (आज 2024 से 2295 एवं विक्रम संवत 2080 तथा हिजरी संवत से 622 वर्ष पूर्व)✍️ डॉ बालाराम परमार 'हॅंसमुख'सेवा निवृत्त प्राचार्य केंद्रीय विद्यालय संगठन :::::::::::::::::::::::::::::::::: महाराजा विक्रमादित्य "हेमकर्ण" और उज्जैन नगर का इतिहास लगभग 2300 वर्ष पुराना है। समयांतराल में उज्जैन का अन्य नामों में परिवर्तन हुआ है। आज का उज्जैन भारत के साथ ही साथ एशिया महाद्वीप का एक महत्वपूर्ण शहर है। जिसकी अपनी ऐतिहासिक पहचान व छवि एक हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म केंद्र के रूप में रही है। स्कंद पुराण में उज्जैन को मंगल ग्रह की उत्पत्ति का स्थान माना गया है तथा अग्नि पुराण के अनुसार उज्जैन शहर को मोक्ष देने वाला स्थान बताया गया है। भारत के चार स्थानों में होने वाला पवित्र 'कुंभ' , सनातन हिन्दू धर्म का एक पवित्र स्नान पर्व भी यहां प्रत्येक 12 वर्ष में लगता है। गरुड़ पुराण में अवंतीका नगरी व अवंतीका साम्राज्य का उल्लेख है। उज्जैन नगर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन के लिए विश्व विख्यात है । 
🟠 ब्रह्म पुराण में इंद्रासन(उज्जैन)का सबसे अच्छे शहर के रूप में वर्णन मिलता है। उज्जिन (उज्जैयिनी) को अग्नि पुराण व गरुड़ पुराण में 'मोक्षदा' और 'भक्ति- मुक्ति' स्थान की संज्ञा से नवाजा गया है । राजा भर्तरी की गुफा में भगवान विष्णु के चरण चिन्ह (विष्णो: पादमवंतिका) होने के कारण इसकी पवित्रता अक्षुण्ण है। मान्यता है कि भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ का अंतिम संस्कार क्षिप्रा तट पर किया था। स्कंद पुराण में लिखा गया है कि शिप्रा नदी की परिक्रमा करने से पितृ दोष, पूर्व जन्म के पापों का नाश, मोक्ष की प्राप्ति, शारीरिक व्याधि आदि से मुक्ति मिलती है। शिव पुराण में एक जगह वर्णन मिलता है कि क्षिप्रा नदी तट पर स्थित अवंतिकापुरी तीर्थ स्थल पर कदम रखने से ही पूर्ण फल की प्राप्ति होती है। आज का 'रामघाट' भगवान राम के पिता श्री के अनुष्ठान वाला स्थल है। जहां कभी राम, लक्ष्मण,भरत और शत्रुघ्न के चरण पड़े थे। 🟠 अवंतिका नगर ने 2400 वर्ष में कुशस्थली -उज्जिन- प्रतिपाल- पद्मावती- भोगवती- अमरावती- विशाला- इंद्रासन और उज्जैन आदि नामांकरण और नाम परिवर्तन की लंबी यात्रा की है। सबसे पहले आज की उज्जैन नगरी का नाम अवंती और कुशस्थली था। यह मालवा पठार का एक शक्तिशाली साम्राज्य था। लगभग 1200 ईसा पूर्व महाराजा कार्तवीर्य अर्जुन ने अवंती साम्राज्य की स्थापना की थी। करीब 1000 ईसा वर्ष पूर्व महाराजा जयंत ने इसे एक शक्तिशाली राज्य बनाया। इसके 100 वर्ष बाद अर्थात 900 ईसा पूर्व महाराज दुष्यंत ने सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र स्थापित और विकसित कर जग में इसकी ख्याति फैलाई। महाराजा भरत ने 800 ईसा पूर्व इस पर राज्य किया और इसे समृद्ध व सुखी राज्य बनाया। महाराजा शिबि ने 600 पूर्व एक आदर्श राजा के रूप में राज्य किया । शिबि महाराजा न्याय, दान एवं साहस के लिए जाने जाते थे। लगभग उसी समय उज्जैनी को कुशस्थली के नाम से भी पुकारा जाता था। महाराजा शिबि का उल्लेख महाभारत एवं पुराणों में भी आता है।
🟠 महाराजा विक्रमादित्य 'हेमकर्ण' जिन्हें 'विक्रमादित्य प्रथम'; एवं 'विक्रमादित्य महेंद्रादित्य' नाम का भी इतिहास एवं पुराणों में उल्लेख मिलता है। 2300 ईसा पूर्व से 2200 ईसा पूर्व तक मालवा पर राज्य करने वाले महाराजा विक्रमादित्य के तीन वंशजों की संक्षिप्त जानकारी देना यहां प्रासंगिक है ,क्योंकि प्रारब्ध की जानकारी प्रबुद्ध पाठकों को प्राचीन कालीन भारत को जानने, समझने और परखने में मददगार साबित हो सकती है। 
🟠 1.महाराजा प्राधोत: विक्रमादित्य के पूर्वजों में महाराजा प्राधोत का नाम परदादा के रूप में आता है। महाराजा प्राधोत जनपद युग के दौरान अवंतीका साम्राज्य के शासक थे। उनकी रानी का नाम सुरभि था, जो विदर्भ राजा वृषध्वन की पुत्री थी । महाराजा वृषध्वन ने अपनी पुत्री का पालन पोषण एक राजकुमार की तरह किया था। महाराजा प्राधोत के बारे में कई कहानियां और दंत कथाएं प्रचलित है। जिनमें उनकी बुद्धिमत्ता, साहस और न्याय प्रियता का वर्णन मिलता है। महाराजा प्राधोत का सेनापति शंकु था। उनके सभासद का नाम विपत्तय था । वह एक बुद्धिमान , अनुभवी तथा महत्वपूर्ण नीति निर्धारण और निर्णय में सहायता करता था। महाराजा प्राधोत के समय में अवंतीका राज्य एक महत्वपूर्ण राजनीतिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक, कला व साहित्य का केंद्र बिंदु था। 
🟠 2. महाराजा वीर सेन:महाराजा वीर सेन की पत्नी का नाम कामावती था। कामावती कोसल(कौशल )राज्य के महाराजा चंद्रसेन की पुत्री थी। कोसल(कौशल )राज्य प्राचीन भारत में एक महान शक्तिशाली राज्य था और उसकी राजधानी अयोध्या थी । अयोध्या धाम सरयु नदी तट पर स्थित अति प्राचीन नगरी है ।यह नगरी हिंदूओं के आराध्य भगवान श्री राम की जन्म स्थली और राजा दशरथ के साम्राज्य की राजधानी रही है। महाराजा वीर सेन के दो भाई -भीमसेन और रूचि सेन थे। 
🟠 3. महाराजा गंधर्व सेन: महाराजा गंधर्व सेन विक्रमादित्य "हेमकर्ण" के पिता तथा अवंतीका साम्राज्य के शक्तिशाली और न्याय प्रिय महाराजा थ़े । महाराजा गंधर्व सेन की महारानी गढ़ कालिका थी। जिनसे राजकुमार भट्टी गुप्त, राजकुमार विक्रमादित्य और राजकुमार राज्यवर्धन तथा राजकुमारी कौमुदी और राजकुमारी यशोमति का जन्म हुआ था उन्होंने अपने प्रताप से संपूर्ण मालवा क्षेत्र में सुख और समृद्धि का परचम लहराया था । महाराजा गंधर्व सेन का सबसे बहुमूल्य, अप्रतिम और युगों युगों तक स्मरण करने वाला योगदान यह था कि उन्होंने अपने पुत्र विक्रमादित्य "हेमकर्ण" को अवंतीका का अनागत एक महान सम्राट के रूप में देखा और उसके अनुरूप ''हेमकर्ण" को अवंतिका साम्राज्य का अतुलनीय योद्धा निरूपण हेतु उस जमाने की सर्वोच्च व सर्वश्रेष्ठ शिक्षा- दिक्षा देने का प्रावधान करवाया था । विक्रमादित्य "हेमकर्ण" अपने माता-पिता की आशा, इच्छा और विश्वास पर खरा उतारे । यही कारण है कि आज 2300 वर्ष बाद भी भारतवर्ष में मान सम्मान और गर्व के साथ याद किए जाते हैं। मध्यप्रदेश की जनता ने इस महावीर- महादानी - महान्यायवादी के सम्मान में 1 मार्च 1957 को उज्जैन में विक्रम विश्वविद्यालय की स्थापना कर आजाद भारत में भी अजर-अमर कर दिया है। महाराजा गंधर्व सेन एक प्रतापी एवं दूर दृष्टि रखने वाले राजा थे । वे क्षिप्रा ,बेतवा,चम्बल ,माही, धसान आदि नदियों के जल ग्रहण क्षेत्र के सभी राजा- महाराजाओं से मित्रता का व्यवहार करते थे। ***महाराजा विक्रमादित्य***: महाराजा विक्रमादित्य को हेमकर्ण अर्थात सोने के कान वाला अर्थात महादानी के नाम से भी जाना जाता था। विक्रमादित्य दो शब्द विक्रम और आदित्य से बना है, जिसका अर्थ है सूर्य की तरह प्रबल एवं सूर्य के समान विक्रमी- पराक्रमी । उनका उपनाम ''हेमकर्ण'' उनके दानशीलता और सौंदर्य का प्रतीक था। महाराजा विक्रमादित्य गंधर्व सेन और महारानी गढ़ कालिका की दूसरी संतान थी। उनके बड़े भाई राजकुमार भट्टी गुप्त थे और वह गंधर्व सेन के उत्तराधिकारी माने जाते थे और उन्होंने गंधर्व सेन की मृत्यु के बाद कुछ वर्षों तक अवंतिका पर राज्य भी किया था। शारीरिक सौष्ठव, सौंदर्य व चरित्र को देखते हुए महाराज गंधर्व सेन और महारानी गढ़कालिका ने विक्रमादित्य को भविष्य का 'महान एवं अद्वितीय राजा के रूप में तैयार किया था । उनकी इच्छा अनुसार बाद में विक्रमादित्य ने अपने बड़े को हराकर अवंतिका पर अधिकार कर लिया था। 
🟠 किंवदंती के अनुसार विक्रमादित्य ने 20 वर्ष की आयु में राजपाट संभाला और 100 वर्ष तक राज्य किया । विक्रमादित्य के छोटे भाई राज्यवर्धन थे। विक्रमादित्य ने अपने छोटे भाई को सेनापति जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया था । सेनापति एक उच्च सैन्य अधिकारी का पद होता था, जो राज्य की सेना का नेतृत्व करता था। राज्यवर्धन को सेनापति के पद पर नियुक्त कर अपने छोटे भाई की सैनिक और नेतृत्व क्षमताओं का सम्मान किया था। सेनापति राज्यवर्धन ने अपनी सैन्य कौशल व क्षमता का परिचय देते हुए सिंधु राज के महाराजा शशी धर्मा, गुजरात राज्य के महाराज जय सिंह , वंग राज्य (वर्तमान बिहार बंगाल) राज्य के राजा शशांक एवं कौशल राज्य के महाराजा वीर केतु पर विजय के साथ-साथ मालवा के दो राजाओं- वीर सेन और भीम सेन जिनका अवंती राज्य के आसपास राज्य था ,पर भी विजय प्राप्त कर उन्हें अवंतीका राज्य के अधीन कर लिया था। महाराजा विक्रमादित्य ने कूटनीति का सहारा लिया और अपनी बहनें राजकुमारी कौमुदी का विवाह वीर सिंह के साथ और राजकुमारी यशोमती का विवाह कौशल के राजा वीर केतु के साथ कर मित्रता स्थापित की और उनको उनका राज्य वापस लौटा दिया था। महाराजा विक्रमादित्य की पत्नी का नाम मध्यविंदा था। जिसे मध्यामिनी नाम से भी पुकारा जाता था। 
🟠 महाराजा विक्रमादित्य की दो संताने थीं : बेटा विक्रम सेन और बेटी शक्ति। राजकुमारी शक्ति का विवाह कामरूप ( वर्तमान असम ) के राजकुमार शशी धर्मा के साथ हुआ था। कामरूप के राजकुमार के साथ उनकी बेटी का विवाह राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत बनाने के उद्देश्य से किया गया था। बेटी के विवाह के माध्यम से महाराजा विक्रमादित्य ने महाराजा गनराज और महारानी दुर्गावती के राजनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति का उपयोग अपने साम्राज्य अवंतिका के प्रभाव को विस्तारित करने के लिए किया था। कामरूप के साथ मित्रता स्थापित कर वर्तमान चीन, म्यांमार, कंबोडिया, थाईलैंड, जकार्ता आदि पूर्वोत्तरी क्षेत्र में व्यापारिक सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत बनाने की पुरजोर चेष्टा की थी। माना जाता है कि महाराजा विक्रमादित्य ने 100 वर्ष तक शासन किया । 
🟠 महाराजा विक्रमादित्य की मृत्यु एक रहस्यमय और वीरतापूर्ण तरीके से हुई थी । कहा जाता है कि महाराजा विक्रमादित्य ने जीवन के अंतिम दिनों में वर्तमान बंगाल- बिहार क्षेत्र के गौड़ राज्य के शक्तिशाली और क्रूर राजा शशांक के साथ प्रयाग में 60 वीं सदी में युद्ध किया था। इस युद्ध में वीरता पूर्वक लड़ते हुए महाराजा विक्रमादित्य वीरगति को प्राप्त हुए थे। उनके पार्थिव शरीर को सेनापति आर्यभट्ट द्वारा उज्जैन लाया गया था तथा वर्तमान "विक्रमादित्य की समाधि" स्थल पर अंतिम संस्कार किया गया था। यह युद्ध प्राचीन भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है, क्योंकि इसमें दो शक्तिशाली राजाओं के बीच युद्ध हुआ था। आर्यभट्ट एक वफादार और बहादुर सेनापति थे। जिन्होंने विक्रमादित्य की सेवा में अपना सारा जीवन बिताया था। गौड़ राज्य के महाराजा शशांक के पास जब उनके पुत्र विक्रम सेन की वीरता और युद्ध कौशल की ख्याति पहुंची तो उसने अवंतीका पर राज करने का विचार त्याग दिया। महाराजा वीर विक्रमादित्य की मृत्यु के बाद उनके पुत्र को विधि विधान से 61 वीं सदी अर्थात विक्रम संवत 57 अर्थात 4 वर्ष ईसा पूर्व अर्थात आज से 2024 वर्ष पहले राज्याभिषेक हुआ था। 
✍️मेरीलैंड,संयुक्त राज्य अमेरिका से परिषद के प्रबुद्धजनों की सेवा में त्रुटि सुधार एवं सुझाव हेतु प्रेषित ।

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